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उम्मीद
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उम्मीद 36 : लंदन के कॉलेज में भी टीना का जलवा कायम

टीना को लंदन छोड़कर उसके मम्मी-पापा वापस आ गए। वहाँ टीना हॉस्टल में दाखिल हो गई। एक नई दुनिया, नए लोग, संगी साथी, इमारतें, क्लास रूम, पड़ोसी, शहर, सड़कें, तहजीब, सब कुछ नया। दो ही दिन बीते, टीना अपने शहर, लोग, मम्मी-पापा, दादी और सुरभि को मिस करने लगी।
लेकिन यह बहादुर बालिका जानती है कि वह पढ़ने आई है तो कमजोर नहीं हो सकती। वह यह भी जानती है कि यहाँ की समस्याएं उसे यहीं सुलझानी होंगी। उसे यह भी पता है कि दादी न तो यहाँ कहानियां सुनाने को उपलब्ध हैं और न ही चोट लगने पर सुरभि का मरहम यहाँ मिलने वाला है। ऐसे में जो कुछ भी होना है, सब कुछ खुद से ही करना होगा। वह चुपचाप खुद को तैयार करने लगी। मुश्किल यह है कि क्लास में ज्यादातर छात्र-छात्राएं यहाँ नए हैं। सब एक ही तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। आपस में बातचीत का माहौल भी अभी नहीं बन पा रहा है। तीन दिन हो गए क्लास जाते हुए। कोई दोस्त नहीं बना। टीना ने तय किया कि आज वह कुछ दोस्त बनाकर रहेगी। क्लास छूटी सब कैंटीन की ओर भागे। टीना कोने में खड़ी एक साँवली सी गुमशुम रहने वाली लड़की की ओर बढ़ी और अपना परिचय दिया। अचानक उस लड़की के चेहरे पर खुशी आ गई। उसका नाम है केट। वह केरल से है लेकिन अपने घर, देश से दूर होने की वजह से केट तो खुश थी ही, टीना भी अंदर-अंदर बहुत खुश हुई। टीना को लगा कि जैसे केट उसकी एकदम पड़ोसी हो। आखिर, दोनों भारत से जो थे। ऐसा होता भी है। अक्सर जब हम अपने शहर से दूर होते हैं तो अपने शहर या आसपास का कोई आदमी घर जैसा लगता है। टीना-केट ने एक साथ चाय ली और क्लास की ओर बढ़ गईं दोनों। बड़ी राहत महसूस हुई दोनों को। क्लास ओवर होने के बाद दोनों एक साथ हॉस्टल की ओर गईं। दोनों को महसूस हुआ कि वे एक-दूसरे का सहारा बनेंगी।
अगले दिन से एक साथ क्लास जाने लगीं दोनों। पढ़ाई को एक-दूसरे के कमरे में भी जाने लगीं। देखते देखते दोनों की बॉन्डिंग भी मजबूत होती गई। क्लास,खाना, बाजार सब एक साथ होने लगा। अपनी इस खुशी को टीना ने मम्मी-पापा और दादी से भी शेयर किया। सब खुश भी हो गए लेकिन टीना को दिखाने के लिए। असल में अब सब बिटिया को मिस कर रहे थे लेकिन कोई किसी से कुछ कह नहीं रहा था। जिस घर में एक अकेली टीना के होने से चहल-पहल रहती, अब सन्नाटा है। दादी के माला की रफ्तार तेज हो गई है। मिसेज अरोरा ने फिलवक्त खुद को घर में ही कैद करके रखा है। हाँ, अरोरा साहब जरूर फैक्ट्री जा रहे हैं लेकिन वे भी जल्दी लौट रहे हैं। सब कुछ अनुशासित दिख रहा है। संडे का दिन था। अरोरा साहब ने माँ से अपना दर्द शेयर किया तो उन्होंने भी बेटे से अपना गम साझा करने में संकोच नहीं किया। चाय लेकर आईं मिसेज अरोरा भी माँ-बेटे के गुफ़्तगू सुन पिघल गईं। सब टीना की यादों में ऐसे खोए कि चाय ठंडी हो गई। अब यहाँ सबने तय किया कि टीना से बातचीत में कोई भी यहाँ के हालात बयां नहीं करेगा। जब भी उसका फोन आए, हम सब केवल और केवल उसके बारे में बात करेंगे नहीं तो बिटिया कमजोर होकर दुःखी हो जाएगी। फिर उसका मन पढ़ने में कम लगेगा लेकिन टीना तो जैसे सौ साल का तजुर्बा लेकर पैदा हुई हो। उसने दोस्त सुरभि की मदद से घर के हालात पर नजर रखे हुए थी।
लंदन में बैठकर यह बहादुर लड़की सबको ढांढस देती। दादी को उनके अंदाज में तो मम्मी-पापा को उनके अंदाज में। यह सुनते ही यहाँ सब खुश भी होते और सबके आंखों में आंसू भी आ जाते लेकिन कोई परिलक्षित नहीं होने देता फिर भी बेटी सब जान जाती। इस समस्या के निदान के लिए टीना ने रोज वीडियो कॉल करने का फ़ैसला किया। अब सबके चेहरे आसानी से पढ़े जा सकते थे। कुछ ही दिनों में दूरी कम होती गई। सब कुछ सामान्य होने लगा, जो अच्छा संकेत है।
देखते-देखते दिन, महीना गुजरने लगे। टीना ने केट के अलावा कुछ और इंडियन दोस्त बना लिए। कुछ विदेशी भी उसकी सर्कल में आ गए। प्रोफेसर्स की नजर में भी टीना चढ़ गई। उसकी क्लास परफॉर्मेंस में दिनों-दिन सुधार होने लगा। वह क्लास में हीरो की तरह महसूस की जाने लगी। क्लास के साथी उसे गंभीरता से सुनते। कई तो उसे रोल मॉडल की तरह देखने लगे। यह सब सुनते हुए अरोरा परिवार रोज गर्व महसूस करता। केट समेत कई दोस्तों से भी अरोरा साहब, दादी की बातें होने लगीं। कुछ ही दिनों में दादी लंदन के इस कॉलेज में मशहूर हो गईं। उनकी सीख का असर बच्चों पर होने लगा। कुल मिलाकर टीना ने एक ऐसा माहौल बना दिया कि क्लास से लेकर हॉस्टल तक में भारतीय संस्कारों, दादी-नानी की कहानियाँ, परिवार के महत्व पर चर्चा होने लगी। टीना के विदेशी संगी-साथी अपने-अपने घरों में अरोरा परिवार, खास तौर से दादी की चर्चा करने लगे। यह सब देख टीना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब उसका मन पूरी तरह से पढ़ाई में लग गया। सबकी प्यारी टीना को खुश देखकर साथी बरबस खुश रहने लगे। जिस किसी का मन खराब होता वह सीधे टीना के पास आता और वह दादी की कोई कहानी सुनाकर उसके चेहरे पर मुस्कान बिखेरने का प्रयास करती। इस तरह दादी-नानी की कहानियाँ विदेशी धरती पर भी अपनी खुशबू बिखेरने लगीं।