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सिस्टम की तरह पत्थर बने आँसुओं से मेरी ठन गयी

दिनेश पाठक
फोन उठाये बिना काम नहीं चलता। सारे एप फोन में पहले से ही अपनी जगह बनाये हुए हैं। जब उठाओ किसी अपने के दुनिया छोड़ने की खबर। चाहे व्हाट्सएप हो, फेसबुक हो, ट्विटर हो या कोई और माध्यम। ऐसी सूचनाओं से बच नहीं सकते। बीते एक सप्ताह से लगातार मिल रही सूचनाओं से सिर भारी हो रहा है। 

ऐसी स्थिति देहरादून प्रवास के दौरान 2010 में आई थी, जब आपदा हिलोरें मार रही थी। हर क्षण आकाशीय बिजली का ताण्डव, कभी नदियों में सैलाब तो कभी हिमालय का टूटना और बिखरना, सब जारी था। उसी दौरान संडे का दिन था। दो-चार-छह मौतों की सूचना शाम चार बजे तक 84 तक पहुँच गयी। मुझे यह पता था कि नम्बर इससे ज्यादा है। जो सूचना मुझ तक आ सकी वह तो उत्तराखण्ड के घाटी-पहाड़ी में रहने वाले साथियों की मेहनत का नतीजा थी।

उस दिन मैं तब तक नहा नहीं पाया था। फोन पर साथी बताते, मैं नोट करता और दफ्तर के साथियों से आगे की योजना पर बात करता। जब नम्बर 84 तक पहुंचा तो मैं बाथरूम के दरवाजे पर ही बैठ गया और ऊपर वाले को याद करते हुए जोर से फफक पड़ा।  पत्नी-बच्चे कुछ समझ पाते मैं जल्दी से बाथरूम में घुस गया। पानी खोलकर खूब रोया। आधा घण्टा बाद मैं निकल कर भारी मन से दफ्तर पहुँचा। तब तक मृतकों की संख्या सौ पार कर चुकी थी।

बीते एक सप्ताह से यही हाल है कि हर फोन उठाने से डर लग रहा है। क्योंकि मैं किसी की मदद करने की स्थिति में भी नहीं हूँ। पहले खुद को इतना असहाय कभी नहीं पाया। शायद यह सब कुछ इसलिए है क्योंकि संसाधन बहुत कम हैं और पीड़ित कहीं ज्यादा।  इस चक्कर में रोज कम से कम पाँच-सात अपनों को खो रहा हूँ। 

पहले यह फायदा था कि आप किसी मौत की सूचना मिलने पर पहुँच जाते थे। परिवार से मिलकर साहस देते थे। किसी को आप लिपटकर आँसू गिरा लेते तो कोई आपको लिपटकर अपना गम हल्का कर लेता। पर, यह महामारी आपको यह सब करने से रोक रही है। अब तो हम हाथ मिलाना और गले मिलना भूल ही गए हैं। गम इन तमाम तरीकों से निकल जाता था तो मन हल्का हो जाता था। 

बीते मंगलवार की रात लगभग 11 बजे परिवार में एक मौत हुई। हालाँकि, इस निधन में कोरोना का कोई योगदान नहीं था। मैं एनसीआर में था। निकलते-निकलते 12 बज गए। रात भर चलकर लखनऊ और फिर अयोध्या पहुँचा। अंत्येष्टि कराई। लगातार 36 घण्टे जागने के बावजूद शरीर में कोई खास परिवर्तन नहीं महसूस हुआ। वापस लखनऊ आया। नहाने के बाद तेज थकान महसूस हुई। बच्चों से मदद ली और कब नींद आ गयी, मुझे नहीं पता चला।

अगली सुबह से असमय जाने वालों का सिलसिला तेज हो चला था। चार दिन हो गए सिर बहुत भारी है। एक क्षण को भी इसे हल्का नहीं महसूस कर पा रहा हूँ। नोएडा वापस आकर कोशिश कर रहा हूँ कि आंखों से आंसुओं की धार बह जाए पर यह भी नहीं हो रहा है। कभी साथी, कभी रिश्तेदार, कभी सीनियर तो कभी युवा साथियों को असमय जाते देख ये आँसू भी हमारे सिस्टम की तरह शायद पत्थर हो गए हैं। तभी तो बाहर नहीं आ रहे हैं। 

मुझे पता है कि अगर ये आँसू एक बार जमकर बरस जाएँ तो सिर का भारीपन खुद से गायब हो जाएगा। बल्कि मैं हल्का महसूस करूँगा। पर, समझ नहीं आ रहा, कैसे बनेगी यह बात। सिर का यह भारीपन कब तक रहेगा? कोई है जो मेरी इसमें मदद कर सकता है? शायद नहीं। मैंने भी ठान लिया है आँसुओं को पिघलाकर मानूँगा। पर डर इस बात का है कि कहीं ये सिस्टम की तरह नहीं पिघले तो क्या होगा? खैर, देखते हैं कि कौन जीतता है, मैं या पत्थर बने आँसू? मैं तो हार नहीं मानूँगा।