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गुरु जी, हम मजबूर हैं

दिनेश पाठक

ये मीडिया वालों को पता नहीं क्या हो गया है… किसी बात की गंभीरता तो समझते ही नहीं…विकास हो रहा..इन्हें यही पसंद नहीं…अरे भाई, सड़क चौड़ी होनी है…दोनों ओर गढ्डे हैं…कही से तो मिट्टी आएगी ही। अगर गोमती नदी की तलहटी से हजार दो हजार ट्रक मिट्टी निकाल ही ली गई तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। आखिर ठेकेदार दूर से मिट्टी लाएगा तो काम पूरा होने में वक्त लगेगा। सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट है।
गोमती नदी की तलहटी से मिट्टी खुदाई की ख़बर और तस्वीर अखबार में देख जिले के मुखिया कुछ यूँ ही बड़बड़ाए जा रहे थे। मिट्टी खुदाई रोकने के लिये सीधे तौर पर जिम्मेदार साहब भी उनके कमरे में बैठे उसी पर आँसू बहा रहे थे। उन्हें चिंता इस बात की थी कहीं जाँच-पड़ताल में वे न फँस जाएँ। पेशबंदी में उन्होंने अपने मुखिया को यह भी जानकारी दी कि वे एक बार पहले प्रतिबंध लगा चुके थे। लेकिन चंद रोज बाद ही यह काम फिर से शुरू हो गया।
मुखिया जी ने कहा आप परेशान मत होइए। हम हैं न। कोई भी जाँच एजेंसी हमसे ऊपर है क्या? अरे भाई सरकार सड़क बनवा रही है। शहर की जनता ही इस पर चलेगी। यह सब होगा तो मिट्टी तो खुदेगी ही। नहीं यहाँ, वहाँ से। मीडिया की परवाह करने की जरूरत नहीं है। सर, कैसे न करें परवाह। इनके चक्कर में मैं एक बार चोट खा चुका हूँ-मिट्टी खुदाई रोकने के लिये जिम्मेदार अफसर ने कहा। मुखिया जी बोले- समय के साथ चलना सीखो। सरकार की मंशा समझो। उसी अनुरूप काम करो। देखो पूरे जिले में मिट्टी खुदाई हो रही है। कितने लोगों ने तुमसे इजाजत ली है। दो-चार की ही संख्या होगी। इसका मतलब साफ है कि बाकी खुदाई अवैध हो रही है। जब हम उन्हें नहीं रोक पा रहे हैं तो इन्हें क्यों रोकें?
इस काम को रोकने में नुकसान ज्यादा है। मंत्री जी भी चाहते हैं कि यह सड़क जल्दी बने। इसीलिये उन्होंने अपने खास ठेकेदारों को लगा रखा है। बेहतरीन परियोजना में अच्छी क्षमता के अफसर-इंजीनियर भी लगाए गए हैं। यूँ भी हमारे पास यह अधिकार है कि सरकारी कार्य में बाधा पहुँचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करें।
बात चल ही रही थी कि मोहल्ले में जलभराव की समस्या को लेकर पण्डित जी भी पहुँच गए। कमरे में पहुँचे तो जिले के मुखिया ने पाँव छुए और हालचाल पूछकर बैठाया। फिर बातचीत वहीं पहुँच गई। पण्डित जी बोले –पुरानी बातें तो मैं नहीं सुन पाया लेकिन एक बात साफ है कि मिट्टी गोमती की तलहटी से गलत निकाली जा रही है। यह कोई बात नहीं हुई कि पहले बाँध बनाओ फिर उसके किनारे से मिट्टी निकाल लो। उसके बाद मरम्मत के नाम पर फिर पैसा खर्च करो।
पण्डित जी ने राय दी- इसके लिये जो भी जिम्मेदार हो उसे गिरफ्तार करवा कर जेल में ठूँस दो। शहर के बीचोबीच गोमती नदी के बाँध को कमजोर किया जा रहा है। हर रोज इस रास्ते से सैकड़ों की संख्या में मंत्री, आईएएस, पीसीएस गुजरते हैं। लेकिन अफसोस किसी की नजर नहीं पड़ती। कमरे में नक्शे का उल्लघंन करके खिड़की लगाने वालों को नोटिस देने वालों की, न ही शहर को साफ-सुथरा रखने की जिम्मेदारी उठाने वालों की। सब आँख-कान बंद किए हुए हैं। पण्डित जी के मुँह ऐसे शब्द सुन मुखिया जी अवाक रह गए। बोले गुरु जी आप बिल्कुल सही कह रहें हैं। अभी जो अधिकारी यहाँ बैठे थे, इन्होंने खुदाई रोकवा दी थी लेकिन अब सरकार चाहती है कि खुदाई हो इसीलिए हमारे हाथ बँधे हैं।
मंत्री जी की मंशी के अनुरूप प्रमुख सचिव ने बुलाकर सभी को कस दिया। अब कार्रवाई करें तो खुद पर ही कार्रवाई हो जाएगी। ऐसे में इसे रोकना अपने वश में नहीं रहा। फिर उन्होंने समझाया कि इससे गोमती नदी के बंधे को कोई खतरा भी नहीं है। यह तो सारी अफवाह अखबार वालों ने फैला रखी है। वे इस दावे से लिखते हैं जैसे दुनिया के बड़े-बड़े इंजीनियर अखबारों में ही नौकरी कर रहे हैं। पण्डित जी बोले- भइये बताने वाले इंजीनियर भी हैं और नियमों के जानकार भी, इसलिए अखबार वालों को मत कोसो| अपनी जिम्मेदारी निभाओ, नहीं हो पा रहा है तो नेताओं के कदमों में तो लेट ही चुके हो तुम| ध्यान रखना, काम वही करो कि जब इतिहास लिखा जाए तो तुम्हारे कुछ अच्छे काम की चर्चा हो|

4 comments

  1. आज की स्तिथि

    मैं दुनिया की मारी मारी,
    दर-दर ठोकर खाती हूं।
    आंसू पी-पी कर मैं अंदर ही,
    घुट-घुट कर रह जाती हूं।
    मैंने अक्सर वाणी पर दर्शाया,
    विराम चिन्हों को
    इसीलिए आते जाते हर मोड़ पर,
    मैं लुट जाती हूं।
    जिसने चलना सिखलाया,
    उसने चुप रहना बतलाया।
    डर कर रहना चुप कर रहना,
    उसने हमको समझाया।
    डर कर यदि हम को खड़ा नहीं करते,
    दो राहों पर।
    तो शायद मैं भी जिंदा हो जाती,
    हर चौराहे पर।
    वंशज बनकर पांडवों के,
    यूं ही चुप रह जाते हैं।
    और द्रोपदी हमें समझकर,
    दांव खेलते जाते हैं।
    प्रश्न उठाएं क्या कौरवों पर,
    अपने ही बुजदिल निकले।
    गिनना शुरू किया तो,
    कृष्ण सरी थे कम निकले।
    नींद रात भर नहीं आती,
    दिन भर बात सताती है।
    क्यों आखिर कोई बेटी,
    यू फांसी पर चढ़ जाती है।
    इस दहेज के काले चल में,
    कितनी आंखें रोई हैं।
    कितनी रातों में ये आंखें,
    खुली खुली ही सोई हैं।
    अग्नि धधकती आंखों में,
    फिर भी शीतलता छाई।
    मुख में जिह्वा भी स्थित है,
    फिर भी बोल नहीं पाई।
    मर्यादा की भाषा लेकर,
    सीमा की परिभाषा लेकर।
    व्याकुलता की गांठ किसी के,
    सम्मुख खोल नहीं पाई।
    हे विश्वास मुझे कि,
    पूरा वेश बदल ये जाएगा।
    हे विश्वास मुझे कि,
    पूरा परिवेश बदल ही जाएगा।
    सिर्फ जरूरत है थोड़ा,
    अंदाज बदलने की सबको।
    है विश्वास मुझे कि,
    पूरा देश बदल ये जाएगा।
    बेटी बचाओ।
    बेटी पढ़ाओ।

  2. बहुत बढ़िया। मैं आपके सभी लेख पढता हूँ।

    • शुक्रिया प्रिय प्रखर जी| आपके शब्द मुझे ऊर्जा दे गए| आभार आपका

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