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चीन से ख़फ़ा भारतीयों की पारी शुरू होती है अब

दिनेश पाठक

चीन ने अपनी करतूत दिखा दी है| हमारे 20 जवान तब शहीद हो गए जब दोनों ही देशों की सेना का शीर्ष स्तर पर बातचीत जारी है| सेना इस हमले को कैसे देखती है? केंद्र सरकार इस अघोषित हमले को किस तरह लेगी?, इसके लिए हमें फौरी तौर अपने देश के नेतृत्व पर भरोसा करना होगा और यह मानना होगा कि हमारी केंद्र सरकार जो भी करेगी, उसके सकारात्मक परिणाम ही आएँगे| हमें यह भरोसा भी दिलाना होगा कि देश की अवाम सरकार के साथ है| पर, मौजूदा हालात पर हम क्या कर सकते हैं, यह विचार का विषय है|
आइए, कुछ आंकड़ों के जरिये अपनी भूमिका तलाशते हैं| इस वर्ष जनवरी में हमने चीन से 429.55 बिलियन (अरब) रूपये का सामान आयात किया है| यही आंकड़ा फरवरी में 317.64 बिलियन (अरब) रूपये रहा| ट्रेडिंग इकोनामिक्स डॉट कॉम के मुताबिक अब तक सबसे ज्यादा आयात सितम्बर 2018 में हुआ, जब हमने 467.49 बिलियन (अरब) रूपये चीन को दिये| मार्च से अब तक का डाटा उपलब्ध नहीं है लेकिन इसे जानने में कोई दिक्कत भी नहीं है क्योंकि देश में लॉक डाउन के पहले ही चीन से अंतर्राष्ट्रीय उड़ाने रद्द हो गई थीं| पोर्ट बंद कर दिए गए थे|
मुझे लगता है कि यही वह बिंदु है, जहाँ से अपनी भूमिका अदा करते हुए हम देश की, सेना की मदद कर सकते हैं| कोई यह सवाल बहुत आसानी से कर सकता है कि सरकार चीन से आयात बंद क्यों नहीं कर देती? सवाल सहज वाजिब लग सकता है लेकिन व्यावहारिक तौर पर इसमें अनेक दिक्कतें हैं| जब पूरी दुनिया एक-दूसरे के करीब आ गई है, हम ग्लोबल विलेज की परिकल्पना को साकार कर चुके हैं तो यह सहज नहीं है| हम विकासशील भारत हैं| अनेक अंतर्राष्ट्रीय मंचों से हमारा भी रिश्ता है और चीन का भी| हमें यह भी ध्यान रखना है कि चीन कमजोर नहीं है|
हाँ, अपने हिस्से की भूमिका अदा करते हुए हम उसे कमजोर कर सकते हैं| किसी भी व्यक्ति, समूह या देश की अर्थव्यवस्था पर चोट आज की तारीख में सबसे बड़ा नुकसान कहा और माना जाता है| बस हमें यही करना है| बीते 30 वर्ष यानी 1991 से अब तक के आंकड़ों पर नजर मारें तो पता चलता है कि औसतन हमने 127.03 बिलियन (अरब) रूपये प्रति माह का आयात चीन से हमने किया है लेकिन सिर्फ .01 बिलियन (अरब) रूपये का आयात हमने अप्रैल 1991 में किया था|
यही अब तक का सबसे कम आयात का उपलब्ध डाटा है| मतलब साफ़ है, जिन्दा हम तब भी थे, जब इतना कम सामान चीन से मंगाया और आज भी, जब एक बड़ी रकम देकर सामान मंगवा रहे हैं|
आम आदमी की ओर से एक पहल का समय शायद आ गया है कि हम चीन के सामान का अपने स्तर पर जितना वहिष्कार कर सकते हैं, शुरू करें| ध्यान रखना होगा कि अगर हम सिर्फ एक रुपए के सामान का बहिष्कार करते हैं तो एक दिन में 135 करोड़ रूपये का वहिष्कार करने में कामयाब होंगे| एक साल का गुणा-भाग आप करते रहिए|
मुझे भी पता है कि यह काम एकदम आसान नहीं है क्योंकि हमें भी नहीं पता है कि चीन हमारे जीवन में कहाँ-कहाँ मौजूद है| पर, एक बात तय है कि इलेक्ट्रानिक्स गुड्स में वह हर जगह है| कम्प्यूटर, मोबाइल, कैमरे समेत कई अन्य उत्पाद सस्ती दरों पर चीन हमें देता है और हम उसे हाथों-हाथ लेते हैं|
दो बातें यहाँ महत्वपूर्ण हैं| एक-जब हमें वहीं सामान सस्ती दरों पर मिल रहा है तो भला मंहगा क्यों खरीदें? इसका उत्तर सरकार को खोजना होगा| हमें भी चीन की तर्ज पर अपने गांवों तक उद्योगों का विस्तार करना होगा| इससे हमारे गाँव भी आत्मनिर्भर बनेंगे| स्किल्ड मानव संसाधन को बाहर जाने से रोकना होगा| उसे यहीं सम्मान और पैसे देना होगा| अपनी इस नीति को घर-घर तक पहुँचाना होगा| उद्योग समूहों को आगे आना होगा| लेकिन यह काम सरकार की मदद के बिना नहीं हो पाएगा| तब तक हमें ही चीन की कमर तोड़नी होगी| सरकार का आसरा छोड़कर हम अपनी भूमिका अदा करेंगे तो तय मानिए, बहुत कुछ अच्छा होगा|

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