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फेलियर पर बात होती है सुशांत!

दिनेश पाठक

सक्सेज का प्लान सबके पास है लेकिन अगर गलती से फेल हो गए तो फेलियर से कैसे डील करना है, कोई बात ही नहीं करना चाहता: छिछोरे फ़िल्म में यह डायलॉग बोलने वाला एक शानदार उभरता हुआ एक्टर सुशांत सिंह राजपूत आज दुनिया छोड़कर अनंत यात्रा पर जा चुका है।
मैंने इसी लॉक डाउन के दौरान छिछोरे देखी थी। तब भी इस बयान को खारिज किया था और आज भी खारिज कर रहा हूँ।
हमारे पैरेंट्स तो हर हाल में हमसे बात करते ही हैं। यही वह रिश्ता है जो छोटी सी खुशी से खुश तो होता है लेकिन तकलीफ चट्टान की तरह सहारा भी बनता है।
सुशांत की खुदकुशी पर बात करने का मेरा कोई इरादा नहीं है लेकिन इस हादसे के सहारे मैं देश की नई पीढ़ी से जरूर कुछ कहना चाहता हूँ। हालात कितने भी अच्छे हों या खराब हों, दोनों ही सूरत में अपने और अपनों का साथ न छोड़ें। उनसे संवाद बनाकर रखें। आप पाएँगे कि पूरी कायनात आपके साथ खड़ी है।
ध्यान रखें, चाहे महानायक अमिताभ बच्चन हों या देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या फिर हम सब। माँ की गोद में सब नंगे ही आते हैं। यह एक ऐसा सच है, जिसे झुठलाने वाला झूठा कहा जाएगा। बावजूद इसके अनेक लोग इस सच्चे रिश्ते को भूल रहे हैं। इसका प्रमाण हैं वृद्धाश्रम। प्रमाण है अयोध्या, वृंदावन, काशी की गलियाँ, जहाँ अनेक माएँ अकेले या समूह में घूमती मिल जाती हैं। इन्हें हम कभी भी देख सकते हैं। जबकि इनमें से ज्यादातर के पास अपना भरा-पूरा परिवार है। बेटे-बहू, नाती-पोते हैं।
मैं लौटता हूँ फेलियर पर। जीवन में हर व्यक्ति पास कम, फेल अनेक बार होता है लेकिन वह एक बार पास होने के बाद फेल को देखना ही नहीं चाहता तो इग्नोर मारता है। जब हम छोटे छोटे फेलियर को इग्नोर करते हैं तो बड़े हमारे सामने बरबस आ जाते हैं और फिर हम कहते हैं कि फेलियर पर बात कोई नहीं करता। मैं कहता हूँ कि जब भी किसी युवा को फेल होने की आशंका भी सताए तो वह चुपचाप मम्मी-पापा, शिक्षक के पास बैठकर उसी विषय पर बात करे। देखिए किस तरह अनपढ़, जाहिल, गँवार पैरेंट्स आपकी उस तथाकथित फेलियर पर ठंडा मरहम लगाते हैं। पर, बैठना आपको ही होगा उनके पास। वे तो गँवार हैं। जाहिल हैं। उन्हें आपकी तरह समझ नहीं है लेकिन जैसे ही अपनी समस्या या फेलियर पर आप बात करना चाहते हैं तो उसी जाहिल, गँवार माँ-पिता के पास इतना ज्ञान आ जाता है कि आप को फेलियर में भी वे कामयाबी दिखाने की ताकत रखते हैं।
सन्देश यही है कि आप जितने भी ताकतवर हो जाएं।
कितनी भी बड़ी कुर्सी मिल जाए लेकिन मम्मी-पापा रूपी चिकित्सकों को भूलें नहीं। ये आपके स्थाई डॉक्टर, जज, पुलिस, हैं। हमेशा न्याय ही करते हैं। इस अदालत में अन्याय है ही नहीं। बस हमें भरोसा करना होगा।
हमें कई बार कन्फ्यूजन हो जाता है कि मेरे मम्मी-पापा दुनिया के बारे में भला इतनी समझ कहाँ से लाएँगे? वे तो किसान हैं। छोटी सी नौकरी करते हैं। रिक्शा चलाते हैं या कोई छोटा-मोटा काम करके आजीविका चलाते हैं। जब आप कंफ्यूज होते हैं तो गलत होते हैं। आजमा कर देखिए। पैरेंट्स के पास आपकी हर समस्या का समाधान है। बस आप जमीन छोड़ देते हैं। भरोसा नहीं कर पाते हैं। उनके जीवन के अनुभव रूपी ज्ञान के सागर को हल्के में लेते हैं।
ध्यान रहे, अवसाद में वही लोग जाते हैं जो अपनों से अपनी समस्या पर बात नहीं करते। मैं अनेक ऐसे युवाओं को जानता हूँ जो पैरेंट्स से अपना रिजल्ट तक छिपाने की नाकाम कोशिश करते हैं। अपनी नजर में कई छोटी लेकिन जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण बातें पैरेंट्स से शेयर नहीं करते। इस तरह तकलीफें बढ़ती जाती हैं। इंसान खुद अंदर ही अंदर घुटना शुरू कर देता है। महीने दो महीने में आपकी अवस्था अवसाद यानी डिप्रेशन की बनने लगती है। युवा घर में अकेले रहना शुरू कर देता है। अपनों से नजरें मिलाना उसे मुश्किल लगता है।
अवसाद की इस अवस्था को जो पैरेंट्स, भाई-भाभी, दीदी जैसे रिश्ते पहचान लेते हैं तो इलाज शुरू हो जाता है। नहीं पहचान पाते तो बात बिगड़ जाती है। क्योंकि हर आदमी दाल रोटी के चक्कर में व्यस्त है।
डिप्रेशन यानी अवसाद का एक बड़ा कारण दोहरा चरित्र भी है। हम जो हैं, जैसे हैं, वैसे ही रहना सीखना होगा। उम्र कोई भी हो, अगर आपके पास पैरेंट्स या बड़ों की गोद है तो वहाँ सिर रखकर देखिए। बड़ा सुकून मिलेगा। यहाँ मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चर्चा करूँगा। बीते छह वर्षों में जब भी वे अपनी माँ से मिले। उनकी गोद में सिर रखा तो इसे सबने अपने अपने चश्मे से देखा लेकिन मुझे उस रिश्ते में माँ के वात्सल्य और बेटे का माँ के प्रति सम्मान के अलावा कुछ नहीं दिखा।
आप भी आजमाइए। सुकून मिलेगा। जो हो गया, उसमें तो कुछ कर नहीं सकते। सच को बदल नहीं सकते। सुशांत को नमन। प्रभु से प्रार्थना कि वे उनके परिवार को इस असीम दुःख को बर्दाश्त करने की ताकत दें।
जय हिंद।

2 comments

  1. सत्यवान मिश्र

    आज के इस प्रतियोगिता के युग में युवा पीढ़ी सफलता के सोपान बड़ी जल्दी चढ़ना चाहती है और ऐसा करने के लिए वह किसी भी रास्ते पर चलने में कोई गुरेज नहीं करती। सफल न होने पर वह अवसादग्रस्त हो जाते हैं और अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं।

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