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नागरिकता संसोधन एक्ट 2019: ये हंगामा है क्यूँ बरपा

दिनेश पाठक

मैं कानून का विद्यार्थी रहा हूँ| जब पत्रकारिता में आया तो लगभग 15 वर्ष तक लगातार पुलिस और कोर्ट की खबरों से वास्ता पड़ा| एडिटर बना तो आये दिन इन चीजों से रूबरू होने के मौके ज्यादा मिले| आज जब नागरिकता संसोधन एक्ट 2019 को लेकर बवाल मचा हुआ है तो मेरा मन क्षण भर को भ्रमित हुआ| फिर मैंने पढ़ने का फैसला किया| बरसों बाद कानून की किताब हाथ में उठाया और मौजूदा संसोधन को भी समझा| मुझे जो एक बात समझ आई, वह यह कि इसमें भारत में रहने वाले किसी भी नागरिक को लेकर तो कोई सवाल ही नहीं है| कानून कहता है कि जो मौजूदा समय में भारत का नागरिक है, वह आगे तब तक रहेगा, जब तक वह खुद चाहेगा|
सवाल उठता है फिर यह उठापटक, तोड़फोड़, बवाल क्यों? मुझे दो-तीन चीजें समझ आ रही हैं| इन पर चर्चा करने से पहले एक कहावत, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश में आम है| कौआ कान ले गया…यह कहावत इस मामले में मुझे सटीक दिख रही है| कोई कान टटोलने को तैयार नहीं है या फिर टटोलना ही नहीं चाहता| इसे मैं साफ़ महसूस कर पा रहा हूँ| मैं यूपी से हूँ| लखनऊ में निवास कर रहा हूँ| यूथ से मेरा सीधा रिश्ता है| रोज कुछ न कुछ नौजवान मुझे मिलता है| देश दुनिया की तरक्की की ढेरों बातें भी हम करते ही हैं| इन नौजवानों का सामना करने के लिए भी मुझे पढना पड़ा इस कानून को नए सिरे से| जो कुछ भी मैं समझ पाया हूँ, उसके मुताबिक पहले भारत की नागरिकता लेने / पाने के कानून में मामूली परिवर्तन किया गया है| वह यह कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में सताए हुए वहां के अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी| बशर्ते वे 31 दिसंबर 2014 से पहले यहाँ आ गए हों|
और यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं हो रहे हैं| लगातार हो रहे हैं| धर्म-परिवर्तन की सजा तो अब इन दोनों देशों में आम हो गई है| अफगानिस्तान में शायद यह इसलिए होता है क्योंकि वहां अभी भी कबीलाई संस्कृति ज्यादा है| शायद सबसे ज्यादा परेशानी का सबब यही है| लेकिन होना नहीं चाहिए| क्योंकि ये सब मुस्लिम देश हैं और वहां कोई भी मुसलमान सताया नहीं जा रहा है| अगर कोई ऐसा केस है तो उसका जाति-धर्म से लेना-देना नहीं है| तसलीमा को बांग्लादेश से इसलिए नहीं निर्वासित होना पड़ा कि वे मुस्लिम हैं, उन्हें अपनी लेखनी की वजह से निर्वासित जीवन जीना पड़ रहा है|
इस तरह के अनेक संसोधन पूर्व में भी हुए हैं| जिस एनआरसी को लेकर शोर है, उसका अभी तक अता-पता नहीं है| संसद में देश के गृह मंत्री ने यह तो कहा है कि वे एनआरसी पूरे देश में लागू करेंगे लेकिन यह भी साफ़ किया है कि अभी नहीं| मुझे ऐसा लगता है कि यह सब वोटों के लिए हो रहा है| यूथ के लिए यह एग्जाम का समय है| उनके एग्जाम छूट रहे हैं| टल रहे हैं| स्वाभाविक है कि जब एग्जाम लेट होंगे तो रिजल्ट में देरी होगी| एक अनिश्चितता बनी हुई है| अगले महीने अखिल भारतीय सेवाओं के एग्जाम शेड्यूल हैं| इंटरनेट जैसी सेवाएं बंद होना अब सामान्य घटना नहीं हो सकती लेकिन अचानक तोड़फोड़, आगजनी भी सहज घटना नहीं हो सकती| यह सब सोची-समझी नीति के तहत हो रहा है| पुलिस अपना काम कर रही है बावजूद इसके वोट के लिए हम इतना घटिया कैसे हो सकते हैं? मेरे मन में यह सवाल है| मैं यह भी मानता हूँ कि राजनीतिक दलों को वोटों की चिंता करनी चाहिए लेकिन यह तरीका ठीक नहीं|
देश के नौजवान का करियर ख़राब करके आखिर आपको क्या मिलने जा रहा है| जिस असम का शोर करके एनआरसी पर बवाल काटा जा रहा है, उसकी जमीन बरसों पहले तैयार की गई थी| वहां के हालात वाकई अलग हैं| जो लोग हिन्दू-मुसलमान खेल रहे हैं, उन्हें जानना होगा कि पाकिस्तानी नागरिक अदनान सामी कोई शंकराचार्य नहीं हैं, वे शुद्ध पाकिस्तानी नागरिक हैं| उन्हें भारत सरकार ने नागरिकता दी| तसलीमा नसरीन को भारत ने अपने यहाँ शरण दी| अनेक उदहारण हैं| अभी दो-तीन दिन पहले भी भारत सरकार ने एक पाकिस्तानी मुस्लिम को नागरिकता दी है|
संभव है कि जब एनआरसी लागू हो तो कुछ दिक्कतें आएँ| लेकिन इसे हिन्दू-मुसलमान से जोड़ देना तो उचित नहीं होगा| समय-समय पर हमारी पुरानी सरकारों ने, नेहरु से लेकर इंदिरा जी तक ने नागरिकता कानून में संसोधन किये थे और एक संसोधन मौजूदा सरकार ने कर दिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा| हाँ, आगजनी, हिंसा, तोड़फोड़ से जरुर देश को नुकसान हो रहा है| संभव है कि इस सिलसिले में हो रही कार्रवाई में कुछ निर्दोष भी फंस रहे हों, लेकिन मेरा मानना है कि जब भी बड़ी कार्रवाई होती है तो इस तरह की कुछ दिक्कतें होती ही हैं| हमारे बुजुर्गों ने भी तो कहा है-गेहूं के साथ अक्सर घुन पीस दिए जाते हैं|
मेरा अपना मानना है कि चुनी हुई संसद ने अगर कोई कानून बनाया है तो हमें पहले तो मानना चाहिए| अगर हमें लगता है कि सब कुछ गड़बड़ है तो सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए, न कि देश को गुमराह करके सार्वजानिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना चाहिए| यह सब कुछ राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है| सब जानते हैं कि अब संसद वर्ष 2024 में ही चुनी जाएगी तो उस समय ताकत दिखाना| अभी क्यों?
अगर पालिटिक्स के लिए विषय कम पड़ गया है तो मैं कहना चाहूँगा कि देश में किसान अभी भी मुद्दा है| बेरोजगार अभी भी मुद्दा है| गाँव अभी भी मुद्दा हैं| भ्रष्टाचार अभी भी मुद्दा है| लड़िये न, कौन मना कर रहा है| लहसुन-प्याज, मंहगाई पर आइए| आमजन आपके साथ खड़ा दिखेगा| इन मुद्दों पर पूरा का पूरा विपक्ष फिसड्डी दिखता है मुझे यूपी में| बात चाहे कांग्रेस की हो या समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी की| बिहार-झारखण्ड में भी विपक्ष की भूमिका गौड़ सी होती हुई दिखती है| हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष कुछ ख़ास नहीं कर पा रहा है| उसे अपनी भूमिका संसद, विधान सभाओं से लेकर सड़क तक पर दिखनी चाहिए| पर, नहीं| वे ऐसा करने से परहेज करते हैं|
विपक्ष में अगर मुझे इस देश में कहीं कुछ दिखता है तो ममता बनर्जी की भूमिका दिखती है| वे सही कर रही हैं या गलत, मैं इस पर कुछ नहीं कह सकता क्योंकि मुझे पश्चिम बंगाल की राजनीति की समझ नहीं है| आन्ध्र प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री विपक्ष में रहकर जनता से ऐसे जुड़े कि मौका आने पर जनता ने भारी बहुमत से उन्हें जीतकर राज्य सौंप दिया| तेलंगाना के सीएम भी अपने राज्य के लिए ही सोचते हैं| तभी फिर चुने गए| नवीन पटनायक ने ओड़िसा में बैठकर खुद को राष्ट्रीय राजनीति से भले दूर रखा है लेकिन जनता से बराबर संपर्क में हैं| इसका लाभ उन्हें मिल भी रहा है|
मैं तो उत्पातियों और उन्हें समर्थन दे रहे लोगों से अपील करूँगा कि बंद करो यह सब और मुद्दों पर लड़ो| आगजनी, तोड़फोड़ किसी भी मसले का हल नहीं हो सकता| हम काफी आगे निकल आए हैं| अब दकियानूस मुद्दों से बाहर आइए|