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उम्मीद
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उम्मीद 47 : टीना-मनीष का झगड़ा खत्म, अब दोनों साथ-साथ

मनीष-टीना अभी भी खिंचे-खिंचे हैं। दो दिन से बातचीत बन्द है। दोनों मुश्किल में हैं क्योंकि मनीष के पापा ने टीना को डॉक्टर के पास ले जाने की जिम्मेदारी दी और ऑफिस चले गए।
दोनों की मम्मियाँ घर में हैं और टीना की दादी भी। नाश्ता करने के बाद मनीष ने कहा-टीना तैयार हो जाओ। डॉक्टर के पास जाना है। नहीं, मैं नहीं जा रही-टीना ने कहा। पर क्यों? मनीष ने सवाल पूछा। और मन ही मन बुदबुदाने लगा। यार ये लड़कियाँ भी न, बड़ी अजीब होती हैं। अरे भाई, किसी से गुस्सा हो तो इसका बदला खुद के शरीर से क्यों लेना? उसी से कह-सुनकर बात आगे बढ़ा लो लेकिन नहीं। ऐसा करने वाली भारतीय नारी की अस्मिता संकट में जो पड़ जाएगी। टीना ने कहा-तुमने मेरे बारे में कुछ कहा। नहीं, मैं तो चुपचाप खड़ा हूँ। सोच रहा हूँ कि तुम डॉक्टर के पास कब चलोगी। पापा ने जिम्मेदारी मुझे दी है तो काम तो करना ही होगा। जाओगी तो मैं भी खुश, पापा भी खुश और तुम्हारी सेहत भी ठीक रहेगी। और हाँ सम्भव है कि तुम्हें खुशी न मिले क्योंकि तुम मुझसे नाराज़ जो हो।
मैं किसी से नाराज नहीं हूँ। भला तुमसे मैं किस हक़ से नाराज रहूँगी? हमारा तुम्हारा रिश्ता ही क्या है? चंद रोज पहले ही तो मिले हैं हम? वो तो तुम भगनानी अंकल के बेटे नहीं होते तो मैं बात भी नहीं करती तुम्हारे जैसों से। मैं जानती हूँ तुम्हारी उम्र में लोग लड़कियों के करीब क्यों आना चाहते हैं? समझे या और समझाऊँ। हाँ, बाबा हाँ, सब समझ गया। अब चलो। घण्टे भर हर से यहीं खड़े हो। कुछ न कुछ बोले जा रहे हो। तैयार होने के लिए कमरे से या तो मैं बाहर जाऊँ या फिर तुम? अरे सॉरी। मैं नीचे तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ। फटाफट आ जाओ। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान लिए टीना ने कहा-चलो आती हूँ। सिर्फ 10 मिनट चाहिए।
मनीष ने तब तक गाड़ी पार्किंग से निकाला और पोर्टिको में खड़ी कर बैठ गया। जब टीना कार तक पहुँची और दरवाजा खोलकर पीछे की सीट पर बैठी ही थी कि गाड़ी में गाना चलने लगा-तू प्यार का सागर है…टीना चिढ़ गई। उसे लगा कि मनीष ने चिढाने के लिए यह गाना जानबूझकर चलाया है जबकि सच्चाई से इसका कोई लेना-देना नहीं है। जब उसका ध्यान गया तो उसने टीना को आगे की सीट पर आने का ऑफ़र दिया लेकिन वह फिर खफ़ा हो गई और कहा-मैं कोई प्यार का सागर-वागर नहीं हूँ, मैं पूरी तरह तूफान हूँ, तूफान। या दइया, फिर कुछ गड़बड़ हो गई। टीना ने कहा-यार मनीष तुम समझते क्यों नहीं? तुम ज्यादा कचरा करोगे तो तुम्हारी हास्टल में एंट्री बन्द करवा दूँगी। अंकल-आंटी से मिलने आऊँगी, जब तुम नहीं रहोगे। अभी चलो डॉक्टर के पास। तुनककर वह आगे सीट पर बैठ गई।
मनीष ने गाड़ी क्लीनिक की ओर बढ़ा दी। गाना बन्द हो चुका था। एकदम सन्नाटा गाड़ी में। तनिक देर बाद टीना ने सन्नाटे को चीरा और बोली-कोई कुछ बोलेगा भी या यूँ ही लंदन की सड़कों पर सन्नाटा रहेगा। मनीष ने कहा-बोलो तो आफत और न बोलो तो उससे बड़ी आफत। खैर, बोलो-क्या हाल है? रात में गुस्से में नींद तो आ गई थी? मुझे तो आई नहीं। आंखों में नींद अभी भी भरी हुई है। टीना मुस्कुराई। नींद तो मुझे भी नहीं आई। टेंशन हो रही थी क्योंकि शायद मैं बेवजह गुस्सा हो गई थी।
पता है घर वाले ने हमारे गुस्से को भांप भी लिया था। जब हम रेस्तरां में अलग बैठे। रेस्तरां से लौटते वक्त अंकल ने मुझसे पूछा भी था। मैंने मना कर दिया था कि नहीं, मनीष ने मेरा दिल नहीं दुखाया है। लेकिन तुमने दुखाया तो था कल सिनेमा हॉल में। तुम्हारी एक अच्छी दोस्त बगल में बैठी है और सिनेमा देखते देखते तुम खो जाओ तो कोई भी नाराज हो ही जाएगा। यह बहुत स्वाभाविक है। मनीष ने कान पकड़ा और बोला सॉरी। इट्स ओके-टीना ने कहा और दोनों क्लीनिक पहुँच गए।
थोड़ी देर में डॉक्टर ने जाँच-पड़ताल कर छोड़ दिया। दोनों घर वापस होने को थे तभी मनीष ने कहा-कल की गलती के लिए मैं कुछ हर्जाना देना चाहता हूँ। तुम मेरे साथ एक कप कॉफी पीना पसंद करोगी? टीना ने मुस्कुराकर हामी भर दी। दोनों रेस्तरां में काफी देर तक बैठे रहे। देश दुनिया, मम्मी-पापा, करियर आदि को लेकर बातें होने लगीं। चर्चा इस बात पर भी हुई कि अगर अरोरा अंकल यहां बिजनेस शुरू कर देते तो हम लोग साथ रहते। खूब मजा आता, है न।
टीना ने कहा लेकिन यह बहुत आसान नहीं है। पापा कठिन दौर से गुजर रहे हैं। बीते एक साल में न जाने कितनी परेशानियां झेलीं उन्होंने। यह मैं आसानी से समझ सकती हूँ। मैं तो उनकी मदद के इरादे से लंदन आना ही नहीं चाहती थी, पर पापा की जिद के आगे आना पड़ा। यह कहते हुए टीना इमोशनल हो गई। मनीष ने कहा-जो होता है, अच्छे के लिए होता है। प्रभु पर भरोसा रखो। सब ठीक होगा।

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