Counsellor Dinesh Pathak, Journalist Dinesh Pathak, Counsellor in Lucknow, Parenting Counsellor Dinesh Pathak, Child Counselor in Lucknow, Best Parenting Counselor in Lucknow, Marriage Counselor in Lucknow, Counselor In UP, Parenting Counselor in UP, Freelance journalist and Counselor Dinesh Pathak.
janu
file photo

नाटक-जानू

संदीप और नेहा की शादी को 20 साल हो गए हैं…दोनों में गजब प्यार है…लेकिन तकरार होते देख लीजिए तो आपको यही लगेगा कि अब मार-पिटाई, कुटाई शुरू हुई कि तब| तलाक़ तक की नौबत महसूस कर सकते हैं आप| पर, आप गलत साबित होंगे| इनके प्यार में वह दम है कि यह सब बहुत देर नहीं चलता…घंटे-दो घंटे में मामला फिर बन जाता है…अगर किसी ने बीच-बचाव करने की गुस्ताखी की तो शामत उसकी जरुर तय है| सन्देश यह है कि जब मियाँ-बीवी आमने-सामने हों तो बीच में किसी को नहीं आना चाहिए…

आइये चलते हैं नेहा और संदीप के घर चाय पर….

 

सीनएक

माँ घर में बैठे-बैठे माला भी जप रही हैं और अपने बेटे-बहू को कोसती भी जा रही हैं…

माँ-राम…राम…राम…राम…अरे मेरी तो किसी को परवाह ही नहीं है| न ही संदीप को और न ही मेरी बहू को| राम…राम…राम| सब आपस में ही गुफ्तगू करते रहते हैं| माँ को छोड़ दिया है उसके अपने हाल पर| राम…राम…राम| अब खाए तो खाए न खाए तो न खाए…डॉक्टर के पास जाए तो भी अच्छा, न जाए तो उससे अच्छा…राम…राम…राम…

(उधर, पैंट-कमीज तमीज से पहने मियां संदीप कुर्सी तोड़ते हुए मोबाइल में ऐसे घुसे हैं, जैसे घर नहीं जंगल में बैठे हों| नेहा बिस्तर पर लेटे-लेटे आवाज देती हैं|)

नेहा-अजी सुनते हो…इस फोन से फुर्सत मिल जाए तो कुछ मेरे काम भी करवा दो|

संदीप अनसुना करते हैं या काम की मशरूफियत की वजह से सुन नहीं पाते हैं…

(नेहा फिर आवाज देती हैं)

नेहा-अजी सुनते हो…तुम्हे तो मेरी बिल्कुल चिंता नहीं| फर्जी प्यार का नाटक करते रहते हो..

संदीप का ध्यान फिर नहीं गया…नेहा की ओर

नेहा बिस्तर से उठकर आती हैं…और प्यार से गले में हाथ डालकर कुछ कहतीं…उससे पहले संदीप भड़क उठे…

संदीप-हर चीज का कोई वक्त होता है…कभी भी शुरू हो जाती हो…देख रही हो कितना जरुरी काम कर रहा हूँ| बॉस निकाल देगा, अगर इसे कल सुबह तक नहीं करके दिया…

नेहा-अरे मैंने ऐसा क्या किया…तुम्हारे साथ…बस गुजारिश ही तो कर रही है यह अबला नारी अपने प्यारे पति से (थोड़ी अदा से) कि बाल आज कटवा दो…(बाल लहराना बेहतर रहेगा)| ये तुम्हारी नौकरी है कि गले की माला, जब मर्जी होगी बॉस निकाल देगा…कोई नियम-कानून भी है या नहीं…या फिर कार्पोरेट में ऐसे ही चलता है…जब मर्जी, निकाल दिया और जब मर्जी रख दिया…

फोन में व्यस्त संदीप ने फिर अनसुना किया….

अब नेहा का गुस्सा पूरे सवाब पर….

नेहा-20 साल हो गए शादी को…पूरा जीवन बर्बाद करके रख दिया…न कोई शौक पूरा कर पाए…न ही कहीं घुमा पाए…जेब में फूटी कौड़ी न होने का स्थाई बहाना…जब अपना कोई काम होगा तब तो पता नहीं कहाँ-कहाँ से पैसा भी आ जाता है…और मैं शादी की सालगिरह पर पांच हजार रुपिल्ली भी कभी खर्च नहीं कर पाई…न तुमने मुझे गिफ्ट दिया और न ही मैंने तुम्हें…पैसा ही नहीं होता…कंजूस कहीं के…वो कहते हैं न पूजा के दिन बकरी गायब…यही हाल है तुम्हारा…जब कुछ कहो, पैसे नहीं है…अरे भाई, क्यों कर ली शादी…डॉक्टर ने कहा था क्या…नहीं करते तो कम से कम एक लड़की की जिन्दगी तुम्हारे चक्कर में बरबाद तो न होती…मैं तो उस दिन को कोसती हूँ जब मेरे बाप ने तुम्हें मेरे लिए चुना था| न जाने क्या देखा उन्होंने इस खूसट में…अरे भाई बेटी की शादी कर रहे थे..थोड़ा सोच लेते| कुछ पता कर लेते| लेकिन आ गए चाचा जी के कहने पर और बाँध दिया लाकर यहाँ| जहाँ किसी को मेरी तनिक परवाह नहीं है…

माँ-राम…राम…राम…अरे क्या हुआ| तुम दोनों फिर क्यों लड़ रहे हो…20 साल हो गए शादी को लेकिन अभी तक लड़ना बंद नहीं किया| अब बस भी करो| समझ नहीं आता कि दोनों में प्यार है या खाली-मूली झगड़ते ही रहते हैं…राम…राम…राम…

संदीप…कुछ नहीं माँ…बस आया…

संदीप….नेहा से…भाग्यवान…कभी वर्तमान में भी बात कर लिया करो…हमेशा पीछे ही पहुँच जाती हो…अरे क्या-क्या नहीं किया…जो हो सकता है. सब किया..और भगवान का दिया हम लोगों के पास सब कुछ तो है…छोटा सा ही सही…घर…एक कार…एक होनहार बेटा, उससे ज्यादा होनहार बेटी…जहाँ कोई घूमने जाता है पैसे लगाकर, उन सभी शहरों के चक्कर तुमने वैसे ही लगा लिए…जो बचा है, वह भी घूम लेंगे…तनिक धीरज तो रखो…काहे इतना दिल पर ले लेती हो…हमरी राम पियारी…और हाँ, हर बात में प्लीज मेरे स्वर्गीय ससुर जी को न लपेटा करो…गलत सही, जो भी किया, अब हो चुका है| कितने शरीफ आदमी थे वे| कितना प्यार करते थे मुझे…और तुम्हें भी तो दिलो-जान से चाहते थे, तभी तो (कुटिल मुस्कान के साथ) मेरे जैसा हीरा चुनकर लाये तुम्हारे लिए…उन्होंने तो अपना कलेजा निकाल कर रख दिया…और तुम्हें आनंद ही नहीं आता…वो कहते हैं न…चिरई क जीयु जाय, लरिकन क खेलवना| और हाँ, मेरी जान! कार्पोरेट वाकई बहुत क्रूर होता है| मैं बीते 18 साल से कार्पोरेट में हूँ| नौकरी नहीं गई है तो इसमें तुम्हारा सहयोग और मेरी मेहनत शामिल है….समझी या अभी भी भेजे में नहीं घुसा…

नेहा का गुस्सा और बढ़ जाता है…कमरे में इधर से उधर तेज रफ़्तार टहलते हुए वह अपनी मम्मी को भी लपेट लेती हैं….

नेहा-सब मेरी बकलोल मम्मी की वजह से हुआ है| उन्हें तो मेरे बाप के सामने गाय बने रहना था| यह भी नहीं सोचा कि उनकी लाडली बेटी कहाँ ब्याही जा रही है? थोड़ी सी भी जाँच पड़ताल, पूछताछ तो करनी ही थी न लेकिन नहीं, उन्हें तो इस बात से कोई मतलब नहीं था| बस बाप ने तय किया है तो मान लिया कि सही ही होगा…अब बेटी भुगत रही है…20 साल से केवल और केवल रोना आता है…जब सोचती हूँ अपनी मम्मी और पापा के इस व्यवहार के बारे में….

 

(यह कहते हुए नेहा फफक पड़ती हैं…अब संदीप…मनाने की मुद्रा में…हाथ जोड़ते हैं…हाथ पकड़कर गले लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन नेहा का गुस्सा सातवें आसमान पर…और वे झटक देती हैं…)

नेहा (सुबकते हुए…) तुम अकेले जिम्मेदार हो इस बरबादी और बदहाली के लिए| मेरे करियर का बंटाधार कर दिया…अब तक मैं प्रोफ़ेसर होती…कम से कम दो लाख रूपया मिल रहा होता…लेकिन नहीं तुमने तो करने ही नहीं दिया…तुम्हें डर था कि कहीं मैं तुमसे आगे न निकल जाऊं…चिंता यह भी कि लोग क्या कहेंगे…बीवी की कमाई खा रहा है या फिर बीवी ज्यादा पैसे कमाती है…आदि-आदि…कामचोर हो पूरे के पूरे…अगर कर लेने देते नौकरी तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता…दोनों मिलकर कमाते तो कम से कम पैसों की यह जलालत तो न झेलनी पड़ती| हर रोज की चिक-चिक से मुक्ति रहती| लेकिन कौन समझाए इस पुरुषवादी मानसिकता के अलमबरदार को…इन्हें तो अपनी पड़ी थी सो चढ़ा दिया बीवी को चने की झाड़ पर…और मैं मूरख फंस गई तुम्हारी चिकनी-चुपड़ी बातों में…

(नेहा…यह सब कहते हुए फिर सुबकने लगती हैं…)

संदीप…हे भगवान… अब आप ही बचाओ…

संदीप…देखो नेहा…तुम यह बात तब कहती तो ठीक होता, जब तुम्हारे हाथ में कोई नियुक्ति पत्र होता…तुम अपने भाई के चक्कर में एमए नहीं कर पाई…इसमें मेरा क्या दोष? मेरे अपने सगे साले और तुम्हारे अपने सगे भाई ने हमें धोखा दिया…पहले तुम्हारा फॉर्म फर्जी भरवा दिया| फिर तुम समय से इम्तहान देने भी पहुँची..तब पता चला कि प्रवेश पत्र फर्जी है…अब इसमें मेरा कहाँ दोष है? उस समय मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था| चलो मान लिया…कि अगले साल मुझे कोशिश करनी थी लेकिन तुमने भी तो नहीं ध्यान रखा…अब यह नून-तेल के चक्कर में सब कुछ तो भूलने की आदत पड़ गई है…अगर तुम्हें याद आ गया होता…तो अपन फीस का इंतजाम तो कर ही लेते| तुम्हारा एमए हो जाता, फिर पीएचडी और मेरी छम्मक छल्लो हो जाती डॉ नेहा…और हाँ, मुझे रोज-रोज के ताने पसंद नहीं हैं| अरे यार, मैं भी तो पढ़ा-लिखा हूँ…तुमसे मुझे क्यों जलन होने लगी| तुम बीए, बीएड और मैं एमए, एलएलबी| ध्यान रखना, मैं उन मर्दों में नहीं हूँ जो अपनी बीवी से इर्ष्या करूँ| मैं तुम्हें दिलो जान से चाहता हूँ…यह मुझे रोज साबित करने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए|

(यह कहते हुए संदीप ने नेहा का गुस्सा कुछ कम करने का प्रयास किया…और फिर गले लगाने की कोशिश की…बात बनते-बनते रह गई…मतलब नेहा झिड़क कर दूर चली गईं और फिर से शुरू….)

नेहा-देखो! तुम हद से बाहर जा रहे हो| गलत बात मेरे सामने करना नहीं…समझे कि नहीं…मेरे भाई को बीच में लाने की कोई जरूरत नहीं है…तुम चाहते तो मेरा एमए भी होता, पीएचडी भी और मैं अब तक प्रोफ़ेसर भी होती…लेकिन तुमने चाहा ही नहीं…तुम शुरू से इतने सक्षम थे कि मेरा काम हो जाता…लेकिन तुम्हें तो डर था कि कहीं बीवी मुझसे आगे निकल गई तो…गंवार कहीं के…डरपोक कहीं के…बीवी की तरक्की से इतना डरने वाला इंसान मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा है…और मेरे सामने बहुत ज्यादा काबिल बनने की जरूरत नहीं है| शादी करके आई थी तो कपड़े पहनना भी नहीं आता था ठीक से| नौकरी का ख्याल भी नहीं था दूर-दूर तक मन में| अब जब मदद की, आगे लेकर आई तो बड़ी बड़ी बातें निकल रही हैं….बड़े आये हैं…हाँ नहीं तो…

संदीप…हे भगवान! मेरी नेहा को फ्लैश बैक से वापस लाने में मेरी मदद करो…अन्यथा रात हो जाएगी…दूकान बंद तो समझ लेना मेरे तीन-चार दिन खराब हो जायेंगे…ध्यान रखना फिर आप ही जिम्मेदार होंगे…मैं अपना बेस्ट दे रहा हूँ पति के रूप में, पिता के रूप में लेकिन कोई संतुष्ट ही नहीं होता…कार्पोरेट की मामूली सी नौकरी में जैसे-तैसे खुद को मैनेज करने का प्रयास कर रहा हूँ…इस बात से किसी को मतलब नहीं है कि कार्पोरेट कितना क्रूर होता है| मैं खुद दफ्तर की समस्याओं को लेकर घर नहीं आता तो मान लिया जाता है कि वहां सब कुछ अच्छा ही चल रहा है| मैं मानता हूँ कि कठिन परिश्रम से मैं चीजों को अपने पक्ष में रख लेता हूँ लेकिन मैं भी हूँ तो इंसान ही न| कभी कभी गलती हो जाती है…घर आता हूँ तो शान्ति चाहिए होती है लेकिन यहाँ तो कुछ न कुछ समस्या बनी ही रहती है…

ऊपर से ये फ्लैशबैक का झंझट…तुम्ही उबारो प्रभु…तुम्हीं उबारो…

नेहा-अब तुम्हारे प्रभु ने अगर सुन ली हो तो 15 मिनट में गाड़ी पर मिलो. मैं इंतजार नहीं करूँगी. आज के आज बाल कटने हैं…अन्यथा सोच लेना…

संदीप…मैं तो तैयार ही बैठा हूँ…तैयार तो तुम्हें होना है…इतना गुस्सा तुम्हारे चेहरे पर वैसे भी सूट नहीं करता. तुम तो जानती हो, तुम्हारा गुस्सा मैं दो-चार मिनट भी झेल नहीं पाता…बीपी हाई होने लगता है…

(यह कहते हुए संदीप, नेहा का हाथ पकड़ प्यार का इजहार करने की कोशिश करता है )

नेहा-अब ये नाटक बंद करो…फटाफट उठ जाओ नहीं तो सोच लेना…बैंड बजा दूँगी

संदीप-बैंड वाले भी सज-धज कर ही बजाते हैं…तुम भी ज़रा…सज-धज लो..फिर…

गुस्से में ही मंद-मंद मुस्कान लिए नेहा कमरे में चली जाती हैं…

और इधर संदीप का फोन बज उठता है…

हेलो…हेलो…हेलो…आवाज नहीं आ रही..फोन कट गया…

फिर ट्रिन-ट्रिन….

संदीप-हेलो…हेलो..हेलो..हाँ, बोल मेरे दोस्त नवीन ! कहाँ खो गए थे…वर्षों बाद सुन रहा हूँ अपने यार को…

नवीन…मैं लखनऊ में हूँ…तुमसे मिलकर ही जाउँगा…अपना पता बताओ..

संदीप…अमां मियाँ…मैं तो शहर में नहीं हूँ…तुम कब तक हो..

नवीन…कल तक हूँ.

संदीप…फिर कल मिलते हैं…और हाँ लंच-डिनर जो तुम चाहो…साथ करेंगे. बस आज माफ़ कर दो…

नवीन-हाँ मेरे भाई, कल मिल लेंगे…

संदीप…माँ, आप कुछ कह रही थीं…

माँ-हाँ, वही तुम लोगों की रोज-रोज की चिक-चिक सुनकर परेशान हुई तो सोचा चुप करा दूँ लेकिन कहाँ तुम लोग माने| तब से दोनों का मुँह बंद कहाँ है| कतरनी की तरह चल रही है जुबाँ| कोई किसी से कमतर पड़ने को तैयार नहीं है| अरे क्या चला जाएगा अगर तुम चुप हो जाओगे| गृहस्थी की गाड़ी लड़ने से नहीं, समझने से चलती है| राम…राम…राम…कितना भी समझाओ लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता…राम…राम..राम…अब जाओ, जहाँ जा रहे हो| लौटकर आना फिर बात कर लेंगे…नहीं तो एक राउंड फिर होगा अभी…राम…राम…राम….

संदीप-जी माँ, लौटकर आते हैं…नेहा का कुछ काम करवा दें…बस ये गया और ये आया…

 

सीन-दो

दोनों पति-पत्नी घर से चल पड़ते हैं…एक-दूसरे को प्यार से घूरते / मुस्कुराते हुए…

(क्योंकि नवीन के फोन की वजह से नेहा को थोड़ा इंतजार करना पड़ा और इंतजार नेहा को पसंद नहीं इसीलिए संदीप ने नवीन से झूठ भी बोला…)

बाजार में पहुँचते ही संदीप ने कहा-जानू, तुम बाल कटवाओ, मैं यहीं पास में हूँ…जैसे ही फ्री होना…मुझे रिंग कर देना…

नेहा-हाँ बाबा, हाँ| अब जाओ भी…फ्री होते ही कॉल करूँगी…

(नेहा अन्दर चली जाती हैं और संदीप वहीँ बगल में खड़े हो फोन पर बात करने लगते हैं| तभी नवीन की नजर संदीप पर पड़ती है…दोनों एक दूसरे को देख अवाक| )

नवीन-तुम स्स्साले इतने कमीने हो…शहर में मौजूद होकर भी मेरे से झूठ बोल दिया…ये तो दोस्ती के लिए कतई ठीक नहीं है| अब हमारे बीच वो बात नहीं रही| कहीं न कहीं, कोई दरार जरुर आ गई है| मुझे समझना होगा इसे| अगर मेरे में कोई कमी है तो उसे अभी के अभी बताना होगा तुम्हें…मैं यूँ ही एक दोस्त खो नहीं सकता| तुमने शहर में होकर भी मुझसे झूठ बोला…ऐसे तो तुम कभी थे नहीं…

संदीप-नहीं मेरे यार..ऐसा कुछ नहीं है…बॉस ने कुछ काम सौंपा है..इस वजह से थोड़ी वयस्तता थी….उसी में नेहा ने उत्पात काटकर रख दिया…तुम तो जानते ही हो| कार्पोरेट में काम करना कितना मुश्किल होता जा रहा है| क्या घर-क्या दफ्तर, काम पीछा ही नहीं छोड़ता और नेहा है कि कुछ समझती ही नहीं| जब मन आये तब खुश और जब मन आये तब नाराज| मैं तो उसे मैनेज करने के चक्कर में कई बार दफ्तर में भी डांट खा लेता हूँ| अब तुम तो गुस्सा थूक दो…और अपनी सुनाओ…कैसा है तू…भाभी…बच्चे..मुंबई…सब ठीक है न..

नवीन-पहले तुम बताओ कि झूठ क्यों बोला…बरसों तक हमने एक साथ खाना खाया…एक बिस्तर में सोए…फिर आज ऐसा क्या हुआ कि झूठ बोलना पड़ा…मैं उस कमजोरी को जानना और समझना चाहता हूँ…मैं दोस्त हूँ तुम्हारा…अगर मैं कोई मदद कर सकूँ तो मुझे ख़ुशी होगी…बॉस ने काम सौंपा था तो झूठ बोलने की क्या जरूरत थी…तुम कहते, हम दोनों भाई मिलकर उसे पूरा कर लेते…इसमें झूठ क्यों..यह मेरे गले नहीं उतरने वाला….

संदीप…ऐसी कोई बात नहीं है…कोई इरादा भी नहीं है…चल माफ़ कर दे…मेरे गले लग जा…नहीं तो मेरी हार्ट बीट बढ़ जाएगी…अगर यहीं सड़क पर गिर गया तो तू गले भी लगाएगा, उठाएगा भी और इलाज भी कराएगा…जल्दी कर…और रात में काम मिलकर पूरा कर लेंगे| एक पीपीटी ही तो बनानी है|

 

(नवीन-संदीप एक दूसरे को गले लगाते हैं…इसमें गर्मजोशी दिखती है…फिर जोर का ठहाका लगाकर दोनों अलग होते हैं…)

संदीप…अच्छा अब बता भाभी..बच्चे…मुंबई…सब ठीक…है न…

नवीन-हाँ, यार सब ठीक है…बच्चों को हास्टल भेज दिया है…घर में दिया की चिक-चिक बढ़ती ही जा रही थी…दिन भर दफ्तर में संघर्ष करो| शाम को उसकी जली-कटी सुनी नहीं जा रही थी. बच्चों पर इसका कोई असर न हो, इसलिए उन्हें भेज दिया बोर्डिंग स्कूल…अब आराम से लड़ते और प्यार करते हुए जीवन कट रहा है…

संदीप-प्यार और तकरार के बिना जीवन भी तो नहीं है न| तुमने महसूस किया होगा जब तकरार के बाद प्यार होता है तो मिठास बढ़ सी जाती है…

नवीन-हाँ, ये बात तो है|

संदीप-चलो काफी पीते हैं|

नवीन-हाँ, चल पीते हैं गरमागरम काफ़ी…

(काफ़ी शॉप पर खड़े खड़े दोनों बातचीत करते हैं…)

संदीप-ये बच्चों को हास्टल भेजकर तुमने ठीक नहीं किया…

नवीन-अब फैसला हो गया…मैं जानता हूँ लेकिन घर में रहने से जो नुकसान होता, उससे कुछ कम ही होगा हास्टल में| सोच-समझकर किया है फ़ैसला|

नवीन-आंटी कहाँ हैं? कैसी हैं वो? बहुत दिन हो गया उनसे मिले, अगर यहाँ हैं तो प्लीज मुझे जल्दी से मिलना है| उनके हाथ के पराठे, अचार वाह क्या स्वाद होते थे…

(नवीन फ्लैशबैक में चला जाता है…)

नवीन-क्या दिन थे यार…तुम्हारा घर…सुबह वहीँ, शाम वहीँ…और दोपहर भी वहीँ…सारी चिंता आंटी की…आजकल तो महिलाएं तनिक भी लोड नहीं ले पातीं…और आंटी थीं कि हम तीन-चार लफंगों को आसानी से पाल पोसकर बड़ा कर दिया…संदीप..तुमने बताया नहीं कि आंटी कहाँ हैं, कैसी हैं?

संदीप-तुम चुप हो तब तो बताएं| ख्यालों में ऐसे खोये हो कि मुझे बोलने का मौका ही कहाँ दिया तुमने..चलो, बगल में ही घर है| मैं तुम्हें मम्मी के पास छोड़ देता हूँ…तुम बातें करना फिर मैं नेहा को लेने आ जाउँगा…फिर आज ही शाम को होगी धमाचौकड़ी…देखना मजा बहुत आएगी|

नवीन-तुम भाभी के साथ हो…नहीं फिर थोड़ी देर रुक लेते हैं | कहाँ हैं वह..उनसे भी तो मिलना है…ये तो नाइंसाफी हो जाएगी उनके साथ…आ जाने दो…तीनों साथ ही चलते हैं…

संदीप-नहीं, उसे आने में थोड़ा टाइम है, तब तक तुम चलो मम्मी के पास, गपशप करो…मैं नेहा को लेकर आ जाउँगा…

नवीन-जैसा तुम उचित समझो…

(संदीप की मम्मी कमरे में बैठी जोर-जोर से राम-राम जप रही हैं…माला की गति बहुत तेज है…नवीन ने पैर छुआ…खुश रहो…प्रसन्न रहो…खूब तरक्की करो…खूब पढो-लिखो…देखते ही बोल पड़ी…)

नवीन-आंटी…का आशीर्वाद वैसे का वैसा ही है…जैसा 30 साल पहले था लेकिन आज भी लगता है बिल्कुल टटका

मम्मी-अच्छा, ज्यादा मक्खन बाजी नहीं| चुपचाप बैठ जा| तुम्हें अभी सजा सुनाती हूँ| कहाँ गायब था तू| कई बरस बाद देख रही हूँ तुम्हें | जरा…बस दो माला और बची है, उसे पूरा कर लूं…राम, राम राम..ई मच्छर मुएँ जीने नहीं देते…राम…राम…भगवान का नाम लेने में भी ये बाधक हैं…संदीप से कहकर थक गई कि इनसे निपटने का इंतजाम करो..लेकिन इसे फुर्सत कहाँ मम्मी की बात सुनने की…बीवी की गुलामी में जो जुटा रहता है…

संदीप-मम्मी! अब तुम भी मेरी बैंड बजा रही हो…नेहा तो दिन भर बजाती ही रहती है…तुम तो मेरी मम्मी हो| सौ खून माफ़ करने वाली मम्मी…तुम हो तो जीवन है मम्मी…तुम कहो तो सो जागूँ और तुम कहो तो सो जाऊं मेरी मम्मी…

(संदीप मम्मी को प्यार से लिपट जाता है| मम्मी भी उसके सिर पर हाथ फेरकर दुलारती हैं और कहती हैं-नवीन देखो न, न जाने कब बड़ा होगा…फिर प्यार से झिडक देती हैं..)

मम्मी-तुम यह भी नहीं देख रहे कि मैं जाप का रही हूँ…जब देखो तब छोटे से बच्चे की तरह लिपट जाता है…नवीन समझाओ इसे…अभी भी वैसे ही जैसे 30-35 साल पहले वाला नवीन…कोई परिवर्तन नहीं…राम…राम…राम…

नवीन-करने दो न उसे आंटी…तुम दोनों को देखकर मुझे अम्मा की याद आ गई…

मम्मी-हाँ, कैसी हैं वो…कहाँ हैं..माला जपने के चक्कर में तो मैंने तुमसे न पानी पूछा न ही चाय…(माला किनारे रख देती हैं और फिर राम-राम कहते हुए बोलीं…ये तो पाप हो गया..)

नवीन-वो हमारे साथ नहीं रहतीं| गाँव में हैं…उनका मन मुंबई में बिल्कुल भी नहीं लगता..कभी आती भी हैं तो 10-5 दिन में फिर वापसी की जिद और मुझे भेजना पड़ता है…क्या करूं?

मम्मी-कुछ नहीं करो…बस झूठ बोलना बंद कर दो..तुम्हारी बीवी उन्हें रखना ही नहीं चाहती होगी| प्यार के आगे तो सबका मन लग जाए…करती क्या है मेरी बहू…बच्चे तुम्हारे कितने बड़े हैं…साथ में हैं या उन्हें भी…

नवीन…नहीं..नहीं आंटी…वो बात नहीं है…असल में गीता नौकरी करती है…बच्चे शुरू से ही हास्टल में रहे…इसलिए अम्मा को दिक्कत होती है…घर में कोई रह नहीं जाता न…इसलिए वह केयर नहीं मिल पाती…फिर अम्मा को अकेलापन लगता है| दिन भर फ्लैट में बंद-बंद बोर हो जाती हैं…दोष उनका भी नहीं है…और मेरा भी नहीं…समय का दोष है आंटी| हम चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर सकते…बस फोन का सहारा है…सुबह-शाम बात हो जाती है…आवाज सुन लेता हूँ तो संतोष हो जाता है…

मम्मी-तुम कुछ भी कहो…मैं मानूंगी नहीं…तुमने बहन जी को अपने पास रखने की कोशिश नहीं की…तुम्हारी बीवी इसमें बड़ी बाधा रही होगी…हो तो तुम संदीप के ही साथी न…मैं जानती हूँ तुम जैसे लौंडों को…बीवी आई नहीं कि लगे नाचने उसके आगे-पीछे…अगर मैं मजबूत न होती तो ये नेहा…हमें भी गाँव भेज देती…वो तो तुम्हारे अंकल की पेंशन…फंड…ने ताकत दी हुई है…बेचारी चाहती तो बहुत कुछ है लेकिन बर्दाश्त कर रही है…हमें…पूरी नकचढ़ी है मेरी ये बहू…गुस्सा तो नाक पर ही रहता है…कब मुझ पर खफा हो जाए, कब बच्चों पर…पता नहीं चलता| संदीप तो खैर उसका स्थाई शिकार है…मैं तो बहुत कम बातचीत करती हूँ उससे…घर में शांति ज्यादा जरुरी लगती है..मुझे| क्या फायदा झगड़े का…आजतक तो कोई लाभ मुझे किसी के झगडे में मिलता दिखता नहीं…

नवीन…आंटी, आपने कहा तो पूरे सोलह आने सच…लेकिन मेरे मन में एक बहुत बड़ा सवाल है कि बिना मिले, बिना बात किए…कैसे इतना सच जान गई आप?

मम्मी-नवीन…ये चेहरे की झुर्रियां देख रहे हो न…ये एक दिन में तो नहीं आई होंगी…कभी मैं भी बला की खूबसूरत थी…हम उम्र लौंडे मरते थे उस जमाने में…अब तो अपने बच्चे सामने आयें…कुछ न बोले…तो भी बता दूँगी…कि क्या कहना चाहते हैं…तुम्हारे चेहरे पर वह तेज नहीं है…जो होना चाहिए…खैर, अपना ख्याल रखो…कुछ खाओ-पीओ…तब तक मेरी बहूरानी आ रही होंगी| संदीप गया है न लेने उसे…तब तक मैं कुछ तैयारी कर देती हूँ…तुम्हें फिर से वही पराठे खिलाने की कोशिश करूँगी…

नवीन-जी, आंटी…अच्छा रहेगा…वह स्वाद..फिर कहीं खो जाता है बचपन की यादों में…

 

सीन-तीन

 

(नवीन-आंटी की बातचीत जारी रही| दरवाजे की घंटी बजी| नवीन ने दरवाजा खोला…सामने संदीप…और नेहा थे…)

नवीन-आइए जनाब, आप ही के महल में आपका स्वागत करते हुए मैं बेहद तरोताजा महसूस कर रहा हूँ…

संदीप-नेहा…ये है नवीन…हमारा लंगोटिया यार…मम्मी का दुलारा…साला इतना कमीना है कि कई बार मुझे ऐसा लगता कि मम्मी मुझसे ज्यादा प्यार इसे ही करती हैं…पक्का वाला चमचा है उनका…

नेहा…हाँ…हाँ..मैं सब जानती हूँ…मिली नहीं तो क्या…तुमने नवीन भैया की कहानी इतनी बार बताई है कि सब कुछ महफूज है इसी दिमाग में…अब तुम लोग बैठो…चटपटे समोसे खाओ…मैं चाय बनाती हूँ…

नेहा…मम्मी से मुखातिब हो पूछती हैं…मम्मी…जरा देखिए मेरे बाल कैसे कटे हैं…आप के लाडले से पूछा तो बन्दे ने ऐसे मुंह बनाया जैसे काले मुँह वाला बंदर…

मम्मी-तुम बिल्कुल हिरोइन लग रही हो नेहा…इससे क्या पूछना…इसका तो खुद का मुँह कड़ाही जैसा है…जोरू का गुलाम कहीं का…

नेहा-मम्मी, प्लीज, इन्हें ऐसा मत कहा करो..मुझे खराब लगता है| कुछ भी हो हैं तो मेरे पति ही…और आपके साहबजादे भी तो हैं…

मम्मी-हाँ…हाँ..सो तो है लेकिन तुम मेरे सामने उसे काले मुँह वाला बंदर बोलो तो मैंने बुरा नहीं माना तो मैंने कडाही जैसा मुँह कहा तो बुरा क्यों मानने लगी| अरे भाई तुम्हारा पति है तो मेरा लाडला भी तो है| ध्यान रहे….ऐसी बानी बोलिए, मन का आप खोय| औरन को शीतल लगे, आपुहिं शीतल होए||

वैसे भी संदीप जब से तुम्हारी संगत में आया, बिगड़ गया है…अब मेरी सुनता कहाँ है…अब तो केवल तुम्हरे आगे-पीछे नाचता हुआ दिखता है मुझे…

नेहा…मुस्कुराती हुई विजई भाव से रसोई में चली गई…

नवीन-आंटी…आपने तो संदीप की बैंड बजा दी…वह भी इसकी बीवी यानी मेरी भाभी के सामने…अच्छा किया…ये इसी का पात्र है…थोड़ी देर पहले मैंने फोन किया तो साफ़ झूठ बोल दिया कि शहर में नहीं है…और मिल गए बच्चू बाजार में…तो चेहरा देखने लायक था…

मम्मी-झूठ तो ये मेरे सामने बोल रहा था फोन पर लेकिन एक बार भी नहीं बताया कि तुमसे झूठ बोल रहा है…अगर बता देता तो शायद मैं खुद ही इसे फटकार लगाती| तुमसे झूठ बोलने का कोई कारन नहीं होना चाहिए| असल में, मैं जानती हूँ| तुम्हारे फोन के ठीक पहले श्रीमान बीवी से लड़ाई कर रहे थे| मैं यहीं बैठे-बैठे सुन रही थी| हल्दीघाटी में क्या युद्ध हुआ होगा, जो यहाँ चल रहा था…

एक बार तुम और जान लो| मैं ट्रेडिशनल सास की छवि को तोड़कर ही दम लूँगी| घर में शान्ति के लिए कई बार मैं जानबूझकर संदीप की बेइज्जती करती रहती हूँ| इससे नेहा खुश हो जाती है…देखा नहीं अभी कैसे गौरव भाव लिए अंदर गई है…राम…राम…राम..क्या जमाना आ गया है|

संदीप-मम्मी, घर में सुख-शांति के सारे फार्मूले इसे दे दोगी तो ये अपने घर में लागू तो करेगा नहीं, दोस्तों के बीच मेरी बैंड बजाता फिरेगा अलग से| और ऐसा रायता फैलाएगा कि हम समेट नहीं पाएँगे..तिल का ताड़ बनाने में इसका कोई सानी नहीं है…

नेहा…चाय, गरम चाय…जो पिये वो भी पछताए और जो न पिए शर्तिया पछताए…मैंने चीनी बिल्कुल नहीं डाली है…केवल मम्मी की चाय में पड़ी है चीनी…नवीन भैया, आपको कितनी चीनी दूँ…

नवीन- नहीं भाभी, बिल्कुल नहीं…वो क्या है न, जीवन में इतनी मिठास शादी के लड्डू के बाद भर गई है कि बाहर की सभी तरह की मिठाई बंद…

नेहा-भैया…आप भाभी पर व्यंग कर रहे हैं उनके पीछे…या सच में मिठास बहुत ज्यादा है..सच बता दीजिए…नहीं तो मैं चुगली कर दूँगी…

संदीप-नवीन…तुमने गलत बयाना ले लिया बेटा…अब यह बात किस रूप में भाभी के पास पहुंचेगी, तुम्हें अंदाजा भी नहीं है…बढ़ा-चढ़ा कर चीजों को पेश करने में मेरी बीवी की पीएचडी है| पूरा मोहल्ला परेशान है इससे…इतनी दवाई कराई लेकिन इसके पेट में कुछ भी नहीं पचता| इधर से लेती है, उधर उड़ेल देती है…

(अपने सम्मान में इतनी बातें सुनते ही नेहा की त्योरी चढ़ गई| इशारे में ही धमकी देते हुए कप लेकर अंदर चली गई…)

(रसोई से ही आवाज आई…)

नेहा…संदीप, जरा सुनना तो इधर…

संदीप-आया मेरी जान..

(अंदर पहुंचने के बाद… संदीप और नेहा रसोई में बोल रहे होंगे और सब कुछ बाहर सुनाई देगा)

संदीप…बोलो, क्या हुकुम है मेरे आका…

नेहा…दोस्त और मम्मी के सामने मेरी ही बैंड बजानी शुरू कर दी…देखो…मैं बहुत ज्यादा उड़ने की इजाजत नहीं दे सकती…तुमने मार्केट से लौटते हुए मिन्नतें की थी इसलिए कुछ बोल नहीं रही हूँ…समझे कि नहीं…

संदीप…अरे ऐसा क्या कहा मैंने भाग्यवान…दोस्तों के सामने थोड़ा बहुत हंसी-मजाक तो चलता है…इसमें बुरा मानने वाली कोई बात तो है नहीं…अभी तुम भी मेरी बजा देना…मौका कहीं गया तो है नहीं…

नेहा-बातों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने में अगर मेरी पीएचडी है तो तुम्हारी एक हजार कमियाँ छिपाने पर भी मैंने डीलिट कर रखी है…जिस दिन अपने पर आ जाऊँगी…लाइन पर आ जाओगे…समझे…हर आदमी को अपनी औकात में रहना चाहिए…जो उड़ता है उसे गिराना मुझे बखूबी आता है…

संदीप-क्यों बातों को तिल का ताड़ बना रही हो…दोस्त आया है…चलो..थोड़ा गपशप करें…और हाँ, जरा यह भी बताना मेरी जान, तुमने कितने आदमियों को अब तक गिराया है? मुझे तो यही पता था कि केवल मुझे ही आए दिन गिराती रहती हो…

नेहा…चलो…तुमसे तो मैं रात में निपटूंगी…पहले तुम्हारे दोस्त और अपनी सासु माँ से थोड़ा गपशप कर लूं…रात में सभी मर्दों का हिसाब-किताब देती हूँ तुम्हें…

(फिर दोनों एक-दूजे का हाथ थामे मुस्कुराते हुए आते हैं…)

नेहा…सॉरी नवीन भैया…वो हम लोग खाने के बारे में डिस्कस कर रहे थे..शाम हो रही है न| क्या खाना पसंद करेंगे…मम्मी..आप बताओ, नवीन भैया की पसंद का ही कुछ बनाते हैं…

नवीन-देखो भाभी, उड़ते उड़ते सुन तो मैंने लगभग सब कुछ लिया है…अभी आपने इसकी जो बजाई है, कसम खुदा की मुझे मेरे दिन याद आ गए…क्षण भर को तो लगा कि मैं मुंबई की अपनी किचेन में हूँ और सामने मेरी बेगम जान…आहा…क्या कहने…मुझे तो संदीप की रात पर तरस आ रही है…बेचारा मेरा संदीप…

नेहा…इसका मतलब आप और भाभी भी…मम्मी बताइए न| बातें तो होती रहेंगी…खाना भी बनना है|

मम्मी-ये पराठा चोर था..एक जमाने में…आम का अचार (चटखारे लेंगी अम्मा) और पराठा चुराने में इसका कोई जोड़ नहीं था…चार-छह पराठे गायब करना इसके बाएं हाथ का खेल था…तुम पराठे तो जरुर बनाओ…अचार चुराना न पड़े इसे…ऐसे ही दे देना…सब्जी, रायता भी बनेगा तो अच्छा रहेगा…सब्जियाँ दे दो, मैं अमनियाँ कर दूँ…

नेहा-जी मम्मी जी, मैं लाती हूँ सब्जी…वैसे कौन सी सब्जी पसंद करेंगे नवीन भैया…

मम्मी-अगर गोभी है तो ले आओ, अमनिया कर दूँ…नहीं है तो अपने निठल्ले पति से कहो जाकर ले आए…नवीन को आलू-गोभी-मटर की सब्जी…हरी धनिया डालकर…परोस दो तो तीन-चार पराठे ज्यादा ही खा लेगा…ये पेटू

नवीन…आंटी, आपने सारा बचपन लाकर सामने रख दिया…क्या दिन थे…वाह…भाभी क्या बताऊँ, जब तक चोरी वाला पराठा पेट में न जाए, मन और पेट दोनों नहीं भरता था…आप बिल्कुल वही बना दो..जो आंटी ने कहा…

मम्मी-तुम बाकी तैयारी करो…पराठे मैं सेंक दूँगी…नवीन को अच्छा लगेगा…

नेहा…जी, मम्मी जी| मैं वैसा ही करती हूँ, जैसा आपने कहा…

नेहा…धत्तेरे की…गोभी तो नहीं है…संदीप…प्लीज गोभी ला दो या मंगा लो…

संदीप-अभी लाया मेरी जान…ये गया और ये आया…

नेहा-हाँ, जरा जल्दी…

नवीन-आंटी, दो चार पराठे एक्स्ट्रा सेंक देना…मान लो रात में भूख लग जाए या बचपन याद आ जाए…

मम्मी-हाँ-हाँ, सेंक दूँगी बाबा…पूरे पाँच-छह पराठे रख दूँगी…तुम्हारे सिरहाने…अंचार भी…रात में एक बार उठकर खा लेना…अब चोरी करेगा तो न तुम्हें अच्छा लगेगा और न ही इस घर में किसी और को…

नवीन…सही कह रही हैं आंटी…लेकिन पराठा अचार के साथ ही रखियेगा…

(खाना बन गया| सबने एक साथ बैठकर खाया…खाना खाते समय टीवी पर धारावाहिक “बस थोड़ा सा” चलने लगा…और उसके मुद्दों पर चर्चा करते हुए सब लोग अपने-अपने कमरे में सोने चले गए…नवीन को गेस्ट रूम में सुलाने के बाद संदीप भी अपने बेडरूम की ओर रवाना हुआ….)

 

 

सीन चार

(बेडरूम अंदर से बंद…और संदीप दरवाजे पर…नेहा…नेहा..आवाज लगा रहा..)

तनिक देर बाद आवाज आई..आ रही हूँ बाबा…बाथरूम में हूँ….

संदीप-तुमने तो डरा दिया यार…

नेहा…क्या डरा दिया यार…बोलो…बाथरूम में जाना कोई जुर्म है क्या…सुबह से तुम्हारी सेवा में लगी थी…शाम से तुम्हारे ही दोस्त की सेवा कर रही हूँ…अब क्या दो मिनट के लिए बाथरूम में मैं सुकून से रहने का हक़ भी नहीं रखती…तुम बताओ तो जरा…क्यों भड़क रहे हो…मुझ पर| तुमने दिया क्या है मुझे जो इतना ताव दिखा रहे हो…एहसान मानो मेरा…तुम जैसे खूसट आदमी के साथ मैं रुकी हूँ…दूसरी होती न तो अब तक कब का तुम्हें …..छोड़कर जा चुकी होती…समझे…

संदीप…यार नेहा..भड़क तो तुम रही हो मुझ पर…मेरे प्यार के चार शब्द के बदले तुमने कांटे भरे चालीस शब्द फेंककर मार दिए…मुझे…वह भी जोर-जोर से| नवीन सुन रहा होगा, क्या सोचेगा हमारे बारे में…मम्मी का तो खैर रोज का ही है…

नेहा…देखो..मेरी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता…कि कोई क्या सोचेगा मेरे बारे में…मैं कतई नहीं सोचना चाहती…सोचना तुम्हारा काम है…समझे कि नहीं…जब तुम मेरी बेइज्जती करोगे तो भुगतना भी पड़ेगा…तुम एहसान मानो मेरा…तुमने अपनी मम्मी और अपने दोस्त के सामने मेरी बैंड बजाई और मैं तो फिर भी बेडरूम में तुम्हारी बजा रही हूँ…और हाँ, ध्यान रखना…यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है…

संदीप…अच्छा बाबा..माफ़ कर दो…आगे से ध्यान रखूँगा..

(संदीप कान पकड़कर उठने-बैठने लगा…लेकिन नेहा फ्लैशबैक में जा चुकी थी…)

नेहा…याद है तुम्हें…जब हम शादी के बाद पहली बार सिक्किम गए थे…जहाँ केवल हम दोनों ही थे…वहाँ भी तुम्हारे दिमाग में मैं नहीं थी…घर, परिवार, यहाँ के काम…और भी बहुत कुछ जो मुझे कतई पसंद नहीं था…हमारी लड़ाई हो गई…थी| तुम जिम्मेदार थे उसके लिए…

संदीप…यार दोस्त..पुराने कैसेट बजाना बंद करो प्लीज…

नेहा…देखो जरा, कितनी हिम्मत आ गई जनाब को…आ गए न अपनी औकात में…त्योरी देखो जरा…तुम्हरी मैं नस-नस से वाकिफ हूँ…आज की रात फैसला होकर रहेगा…

संदीप-क्या फैसला करने वाली हो तुम बताओ जरा…मैं भी जानना चाहता हूँ…

नेहा…तो सुनो…मैं तुम्हरी बकवास सुन-सुन कर बोर हो चुकी हूँ| मेरे घर में पुताई कराओ…बर्तन का स्टैंड लगवा दो..और हाँ किसी भी तरीके से बर्तन धुलने वाली मशीन लगवा दो…मैं उब चुकी हूँ यह घर देखकर…समझे कि नहीं…

संदीप..तुम तो मुझसे भी उब चुकी हो…उसका क्या…घर में जो भी काम हुआ है, तुमने कराया..

नेहा…मैं दबाव में थी…सौ मर्तवा कहा था मैंने कि एक बार मुझे किसी डिजायनर से मिलवा दो…जो पैसा लगे दे दो…वह घर को अच्छे से मेरे हिसाब से डिजायन कर देता…फिर मैं आराम से करवाती रहती काम लेकिन नहीं, साहब को मेरी सुननी ही नहीं थी…तो अब सुनो….लगातार सुनना पड़ेगा…

संदीप-भाग्यवान अब सो जाओ…सुबह जल्दी उठाना भी है…घर में मेहमान हैं…

नेहा…छोडूंगी नहीं तुम्हें मैं मिस्टर, समझ लेना..इस समय तो तुम्हारे कहने पर सोने की कोशिश कर रही हूँ..

संदीप-या देवी, यह उपकार करो मेरे पर…जो सजा देना है, दे देना…पर अभी के लिए अपना टेप रिकार्डर बंद करो प्लीज…

नेहा…मैं तुम्हें टेप रिकार्डर दिखती हूँ…फिर तुम सोकर दिखाओ…मैं असली वाला बजा देती हूँ..

संदीप-अच्छा बाबा| सॉरी..यार तुम्हारा भी गजब हिसाब है..प्यार करती हो तो बे इन्तहा और नफरत करती हो तो पूरे दिल से| मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया आज तक हमारे रिश्ते की सच्चाई…अब मैं एक चुप, हजार चुप….

नेहा…कुछ देर बाद…संदीप, यार नींद नहीं आ रही है…क्या करूँ..

संदीप…मैंने फ़िलहाल न बोलने की कसम खाई है लेकिन बीवी हो इसलिए तुम्हारी मोहब्बत में बोलकर एक सुझाव दे रहा हूँ…मन ही मन गायत्री मंत्र का जाप करो…बढ़िया नींद आ जायेगी…और हाँ फिर शुरू मत हो जाना…

नेहा ने तकिया उठाया…दो-चार बार दे मारा संदीप पर…फिर दोनों सो गए…

 

(संदीप ने सपना देखना शुरू किया…उसने देखा कि गुस्से में नेहा मायके के लिए चल पड़ी…ट्रॉली बैग लेकर…)

संदीप-अरे मेरी छम्मक छल्लो…कहाँ चल पड़ी…

नेहा-बात मत करो…मैं कहीं जाऊं…तुमसे मतलब?

संदीप-तुम मेरी बीवी हो…यह जानने का हक़ है कि आखिर तुम जा कहाँ रही हो? जैसे तुम्हारा हक मुझ पर है…तुम भी तो पूछती रहती हो…मैं जवाब देता हूँ कि नहीं…

नेहा-हाँ, बीवी हूँ, नौकरानी तो नहीं हूँ न| मैं मायके जा रही हूँ…| मम्मी को बता देना कि नेहा चली गई मायके…फिर वो जब तुम्हारी बैंड बजाएंगी, तब समझ में आएगा…कि बीवी को सताने का क्या मतलब होता है?

संदीप…मेरी मम्मी और मेरी बैंड बजाएँगी…कदापि नहीं…मैं उन्हें जानता हूँ ठीक से…वो ऐसा कुछ नहीं करने जा रही हैं…लेकिन प्लीज तुम मत जाओ न यार..

(संदीप…हाथ जोड़कर…पैर पकड़ने को आतुर…राह घेर कर खड़ा हो गया…नेहा मान गई इस शर्त पर कि आगे कोई गड़बड़ की तो तुम्हीं जिम्मेदार होओगे…)

संदीप…गजब हो तुम भी…कभी भी भड़क जाती हो…जब सिफारिश करवानी हो तो ऐसे ही बता दिया करो…डराती क्यों हो…

नेहा…मैं डराती नहीं हूँ…मैं ऊब गई हूँ…तुम्हारी रोज-रोज की चिक चिक से…मन करता है कि हाथ की नस काट लूँ और जीवन ख़त्म…और यह किसी दिन होके रहेगा…कभी कभी तो मन करता है कि कहीं खिड़की…या पंखे से लटक जाऊं…लेकिन बच्चों का चेहरा दिख जाता है…बस रह जाती हूँ…अन्यथा तुम्हारी और तुम्हारी मम्मी की मीठी-मीठी बातें मुझे कडवी ही लगती हैं…यह सब कहते हुए नेहा सुबकने लगती हैं…

(थोड़ी देर सुबकना जारी है…संदीप मनाने, चुप कराने के प्रयास करते हुए नींद के आगोश में चला जाता है…फिर नेहा खिड़की से फंदा लगाकर ख़ुदकुशी कर लेती है…संदीप अचानक चौंक कर उठता है…नेहा को बिस्तर पर नहीं पाकर बेचैन हो उठता है…नेहा-नेहा…आवाज लगाते हुए भागता है…उसे देखकर ऐसा लगता है कि उसने कोई बुरा सपना देखा है…तब तक बाथरूम से निकल नेहा…आती है…)

नेहा-क्या हुआ संदीप…

संदीप जोर से लिपट जाता है…रोने लगता है…

संदीप…तुम ठीक तो हो न…कुछ हुआ तो नहीं न तुम्हें…मुझे बहुत डर लग रही है…प्लीज तुम ऐसा वैसा कुछ कदम नहीं उठाना…मैं जी नहीं पाउँगा तुम्हारे बिना…

नेहा…हुआ क्या…तुम रो क्यों रहे हो…कोई बुरा सपना देखा है क्या?

संदीप-हाँ, सपना नहीं, मुझे तो अभी भी हकीकत लग रहा है..तब भी जब तुम सामने हो…

नेहा-तुमने देखा क्या सपने में बताओ तो जरा…

संदीप…मैं भूल जाना चाहता हूँ उस सपने को…जुबान पर बिल्कुल नहीं लाना चाहता…सपना था, उसे सपना समझ भूल जाओ…

नेहा…बताओ न प्लीज…

संदीप…मैंने देखा…मैंने देखा…(सुबकते हुए, हिचकियाँ लेते हुए)

नेहा-क्या देखा…संदीप…बताओ…न

संदीप…नहीं, मेरी नेहा ऐसा कर ही नहीं सकती…

नेहा..क्या नहीं कर सकती…तुम्हारी नेहा कुछ भी कर सकती है…तुम बताओ तो जरा…तुम बीस साल में नेहा को जान ही नहीं पाए…बहुत बहादुर है…तुम्हारी नेहा..

संदीप-मैंने देखा…मेरी नेहा…खिड़की से लटकी हुई है…

नेहा…मूर्ख हो क्या…

संदीप-नहीं यार डर लगता है…

नेहा-अच्छा चलो चिल करो| मम्मी जी बताती हैं कि जब सपने में किसी के मरने की बात देखते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि उम्र बढ़ गई…अब तुम्हें मुझे कुछ और बरस झेलना होगा…बुद्धू कहीं के…सो जाओ…अब..और हाँ, गायत्री मन्त्र का जाप पढ़ते हुए सो जाओ…बुरे सपने नहीं आएँगे….

(रात में अचानक बेटे-बहू की बातचीत सुनकर मम्मी भी पहुँच गईं|)

माँ-क्या हुआ नेहा? संदीप क्या हुआ? आवाज देते हुए कमरे तरफ बढ़ गईं…

नेहा-अरे मम्मी जी आप अभी तक जाग रही हैं?

माँ-हाँ बेटा अभी तो जाग ही रही हूँ| बुढापे में नींद कच्ची होती है| मामूली खटपट से भी आँख खुल जाती है और यहाँ तो तुम दोनों बात कर रहे थे| वैसे भी रात में धीमी आवाज तेज ही लगती है| इसलिए मैं चली आई| मन भी तो नहीं मानता| अपने बच्चों को तकलीफ़ में भला कौन देखना चाहता है? रात सोने के लिए होती है और तुम दोनों का डिस्कसन ऐसा चल रहा था जैसे कोई अनहोनी हुई हो…क्या करे माँ उठकर चली आई…चलो अब फिर से सो जाओ…अभी रात बहुत बाकी है…

संदीप…सॉरी मम्मी| सब कुछ मेरी वजह से हुआ है| न मुझे सपना आता| न मैं बडबडाता| न नेहा सवाल-जवाब करती और न ही आपकी आँख खुलती| अब सो जाओ| चलो आपको आपके कमरे में पहुँचा देता हूँ|

माँ-तुम सो जाओ| मैं चली जाऊँगी| अभी मेरे हाथ-पांव दुरुस्त हैं| अपने घर में तो आसानी से इधर से उधर जा सकती हूँ|

संदीप-ठीक हैं मम्मी| गुड़ नाईट…

 

सीन पांच

नेहा-अरे यार संदीप| गुड मॉर्निंग| सात बज गए| सोते ही जा रहे हो| उठो| देखो ये तुम्हारी काम वाली भी नहीं आई| बहुत काम है| क्या करूँ| समझ नहीं आता| तुम्हे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ता| बीवी संकट में आये तो आए….

संदीप-अमाँ यार नेहा, क्यों सुबह-सुबह शुरू हो गई हो| यहाँ तो अभी रात की ही खुमारी नहीं उतरी है| अब फिर तुम शुरू…वैसे हुआ क्या? कहाँ तूफ़ान आया हुआ है? और ये काम वाली मेरी बाई कब से हो गई? मेरी तो जो भी हो, सिर्फ तुम्हीं हो…(अंदाज में शरारत दिखेगी)

नेहा-ये तूफान नहीं तो और क्या है| अब मेड नहीं आई है| रात का पूरा बर्तन पड़ा हुआ है| कल शाम भी नहीं आई थीं देवी जी| अब समझ आ गया या कोई और तरीका निकालूँ, बताने के लिए…

संदीप-नहीं भाग्यवान, कोई तरीका निकालने की जरूरत नहीं है| मैं सुबह-सुबह तुमसे भिड़ने के मूड में हूँ नहीं| और तुमसे भिड़कर कौन सा पद्मश्री मिलने वाला है| खाली-मूली मन ही तो ख़राब होगा| और वो मुझे करना नहीं है मेरी राम पियारी| कुछ समझियु की नाहीं| और वैसे, इसमें नया है क्या? ये तो तुम्हारी साप्ताहिक समस्या है| जब आती है, तुम तब भी परेशान रहती हो और नहीं आती है तब शर्तिया परेशान रहती हो | लेकिन एक बात बताओ-बाई के न आने पर इतना परेशान तो किसी पड़ोसी को मैंने देखा नहीं|

नेहा-हाँ-हाँ, तुम्हें तो जैसे सभी पड़ोसियों की बड़ी खबर है| अपनी खबर रख नहीं पाते| आये हैं, पड़ोसियों की चर्चा करने| घर-घर की समस्या है ये मेड…समझे कि नहीं…आओ दिखाएँ| देखो-मेरी वाली ही शर्मा जी के यहाँ काम करती है| वहाँ झाड़ू लिए कोई दिख रहा है तुम्हें कि चश्मा लाकर दूँ?

संदीप-हाँ यार, अपने शर्मा जी, झाड़ू लेकर जुटे हुए हैं| अच्छा चलो, हम भी मिलकर काम ख़त्म कर लेते हैं| तुम झाड़ू-पोंछा लगा लो और मैं बर्तन साफ़ कर दूँगा|

नेहा-नहीं-नहीं| तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे| मुझे अच्छा नहीं लगेगा| अगर कोई देख लेगा और इसकी चर्चा पूरी कालोनी में होगी| तुम क्या जानो महिलाओं के प्रपंच| घंटे भर में अभी सारे काम ख़त्म हो जाएँगे| तुम बस एक कप तगड़ी चीनी वाली कड़क चाय पिला दो| बस|

(नेहा की आँखों में और चेहरे पर शरारत होनी चाहिए)

संदीप-चाय तो ठीक है| मैं पिला दूँगा लेकिन एक कप चाय के लिए सुबह-सुबह इतना बवाल| समझ में नहीं आता कि ये तुम्हारा प्यार है या नफरत|

नेहा-अब मैंने कौन सा बवाल किया| तुमसे प्यार से कहो तो तुम कौन सा चाय पिला देते हो| तुम्हें जगाने के लिए तो जहर की पुड़िया छोडनी ही पड़ती है| मैं तुम्हें जान चुकी हूँ| वैसे भी, तुम छोटी सी बात क्यों नहीं समझते| मैं तुमसे न कहूँ तो आखिर कहूँ किससे? जानते हो अपनी मम्मा का घर छोड़ तुम्हारे साथ ही आई हूँ| तुम पर मेरा अधिकार है| तुम्हीं से शिकायत कर सकती हूँ| तुम्हीं से झगड़ सकती हूँ| प्यार भी तुम्हीं से करती हूँ| अब इतना भी नहीं समझते…बुद्धू कहीं के…(फिर शरारत)

संदीप-मेरी समझदानी असल में तुम्हारे हिस्से में चली गई है…लेकिन तुमने बताया तो समझ गया मेरी छम्मक छल्लो| ये लो गरमागरम चाय पीयो…और शुरू हो जाओ…मुझे दफ्तर भी जाना है…

(दोनों बैठकर चाय पीते हैं…)

नेहा…बहुत घटिया चाय है यार संदीप…तुम जानते हो कि मुझे ज्यादा चीनी वाली चाय ही पसंद है लेकिन कर गए कंजूसी यहाँ भी…सिर्फ एक चम्मच और डाल देते तो क्या मजेदार चाय बनती, तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा…

संदीप…कभी-कभी झूठी सराहना ही कर दिया करो…मेरी जान…सुबह-सुबह एक बेचारा…बीवी के लिए चाय बनाता है…वह भी पूरे दिल से…लेकिन उसे पसंद ही नहीं आता…इसीलिए मैं तुम्हारा कोई भी काम करने से घबराता हूँ…बाजार से कोई सामान लाओ तुम्हें पसंद नहीं…कपडे लाओ, तुम्हें पसंद नहीं…क्या करूँ…

नेहा-कुछ नहीं…बस अब उठो| तुम मम्मी और नवीन भैया की चाय ले जाओ और मैं फटाफट काम निपटाती हूँ…

संदीप…जो हुकम मेरे आका…

संदीप मम्मी और नवीन की चाय लेकर उन्हें कमरे में देने जाता है…

नवीन-चाय का सिप लेते ही…वाह क्या चाय बनी है…वाकई भाभी के हाथ में कुछ तो है…

संदीप-कमीने ये चाय भाभी ने नहीं, मैंने बनाई है और तुम्हारी भाभी ने इस चाय की बुराई भी की है…

नवीन-अच्छा…रुको…जरा..दूसरी सिप लूँ…फिर बताऊँ…हाँ, वो थोड़ी सी चीनी कम होती तो और बेहतर स्वाद आता…भाभी ने ठीक ही बुराई की है…ये बता तुम्हें आता क्या है? निठल्ला, निखट्टू…आंटी नाराज, भाभी नाराज, शर्तिया बच्चे भी नाराज ही होंगे…क्योंकि तू है ही ऐसा…अच्छा ये बता, बच्चा पार्टी है कहाँ? दिखे नहीं दोनों…

संदीप-असल में दोनों नाना-नानी के यहाँ गए हैं| वहाँ मेरे साले साहब की बिटिया रानी का शुभ जन्मदिन है| वो लोग बेटी पढ़ो-बेटी बचाओ के नारे के साथ जीते हैं…इसलिए बेटे-बेटी में कोई फर्क भी नहीं करते| मैं भी इस बात का समर्थक हूँ पक्का वाला…इसलिए दोनों को एक दिन पहले भेज दिया…हम लोग आज शाम जाएँगे…

नवीन-अच्छा है यार…नाना-नानी का घर तो स्वर्ग होता है बच्चों के लिए…बहुत कुछ सीखने को मिलता है और बहुत कुछ मस्ती भी…वही तो एक ऐसी जगह है जहाँ गलती खुद करो और दूसरों पर डाल दो तो नानी का प्यार नाती-नातिन को और फटकार दूसरे को मिलना है| मुझे तो आज भी नानी का दुलार याद आता है…क्या दिन थे भाई…तुम तो मिले हो मेरी नानी से…आज तो लोग नाना-नानी, दादा-दादी और रिश्तेदारों के पास बच्चों को भेजते ही कम हैं…जबकि खुद उन्हीं की गोद में पले-बढ़े हैं…

संदीप-ये बात तो तुमने बिल्कुल ठीक कही…मेरे बच्चे इस मामले में लकी हैं…दादी का प्यार तो सौ प्रतिशत उन्हें मिल रहा है| स्कूल बंद होते ही या लम्बी छुट्टियों में भी दोनों निकल जाते हैं नानी के यहाँ…कई बार मैं और नेहा जानबूझकर उन्हें रिश्तेदारों के घर भी ले जाते हैं…ताकि बच्चे रिश्तों के महत्व को भी समझते रहें…जो बातें देखकर आसानी से समझ आ जाती हैं, वह किताबें पढ़कर कम समझ आती हैं…

नवीन…बात तो तेरी पूरी सच है| मेरे यहाँ उलट हो रहा है (चेहरे पर हल्का निराशा का भाव आए तो सीन मजेदार बनेगा) लेकिन चलो भाई, यह बचपन पुराण बंद करो| तुम्हें दफ्तर भी तो जाना है| मेरी भी दोपहर बाद मीटिंग्स है फिर शाम की मुंबई की वापसी….

संदीप-हाँ यार, मैं तो भूल ही गया…तुममें न जाने कौन सा फेविकोल वाला गुण हैं, जो मैं चिपका तो बस…साथ ही नहीं छूटता…

(दोनों एक-दुसरे के हाथ ठोंकते हुए ताली बजाते हैं…ठहाका लगाते हैं…फिर संदीप तैयार होने के लिए बाथरूम चला जाता है और नवीन को भी तैयार होने को बोलता है…)

सीन-छह

नेहा-नाश्ता तैयार है…मम्मी जी, नवीन भैया..संदीप…फटाफट आ जाइए…डाइनिंग टेबल पर|

मम्मी-अरे बहुत जल्दी नाश्ता तैयार कर लिया नेहा बिटिया…वो तुम्हारी छम्मक छल्लो नहीं दिखी आज…कल शाम भी नहीं आई थी…तुमने सारा काम खुद कर लिया क्या? मुझे बता देती, कुछ मदद मैं कर देती|

नेहा-कोई बात नहीं मम्मी जी, थोड़ी मदद संदीप ने कर दी और वो महारानी वाकई नहीं आईं…इस बार पैसे काटकर दूँगी..तब समझ आएगा उन्हें…ये लोग न मम्मी जी, कामचोर होते ही हैं…वो श्यामा वाली बाई भी ऐसे ही है…वह तो बेचारी बहुत परेशान रहती है…पार्क में मिली थी बेचारी…कल, कह रही थी..तुम लोग तो दो हजार देकर परेशान हो…मैं तो पांच हजार देकर कुछ ज्यादा ही परेशान हूँ…

मम्मी-हाय दैया, पांच हजार..किस बात के..

नेहा-अरे मम्मी, श्यामा नौकरी पर जाती है| पति सेना में हैं| बाहर पोस्टिंग है उनकी| बच्चों को भी श्यामा को ही देखना है…बाई के जिम्मे बहुत काम है| झाड़ू-पोंछा| खाना-नाश्ता…सब कुछ फिर भी बेचारी का घर गन्दा ही रहता है…खाना अक्सर बाजार से मंगाना पड़ता है श्यामा को…क्योंकि बहन जी महीने में 10 से ज्यादा दिन तक गायब रहती हैं|

मम्मी-फिर तो श्यामा बेचारी बहुत परेशान रहती होगी…पति सीमा पर, वो दफ्तर में, बच्चे स्कूल और महरिन महरानी…इनकी तो कुटाई करनी चाहिए…नारी ही नारी की दुश्मन बनी हुई है…बाप रे बाप..क्या कलयुग आ गया है…राम…राम…राम…

(डाइनिंग सज गई है…गरमागरम चाय, पकौड़े..पराठे…लगे हुए हैं…)

नवीन-भाभी, बाथरूम तक आपके पकौड़े की खुशबू नाक में घुसी जा रही है…पराठे तो बिल्कुल आंटी वाले लग रहे हैं…लगता है आपको आंटी ने अपना गुर सिखा दिया है…

नेहा-आइए भैया…क्यों मेरा सुबह-सुबह मजाक उड़ा रहे हैं…| नाश्ता करिए| देखिए कैसा बना है| मम्मी की तरह पराठे तो मैं कभी बना ही नहीं सकती…उनके हाथ में जो बात है, वो इधर कहाँ…

नवीन-नहीं…नहीं| आंटी का असर आप पर पूरा दिख रहा है| मैं संदीप को देखकर कह सकता हूँ| इस घर में आपके अनुशासन को देखकर कह सकता हूँ| आपकी बातचीत, बोली-भाषा देखकर कह सकता हूँ और हाँ, आपकी फुर्ती तो बिल्कुल आंटी वाली ही है| खाने में स्वाद के तो क्या कहने…जैसे आंटी के हाथों में स्वाद है ठीक वैसे ही आप के हाथों में भी है भाभी…

माँ-नेहा, देख रही हो| यह समझना मुश्किल हो रहा होगा कि यह हमारी खिंचाई कर रहा है कि सराहना| इसकी नस-नस में शरारत भरी हुई है|

नेहा-जी, मम्मीजी| मुझे भी कुछ-कुछ वही महसूस हो रहा है, जो आपको| नवीन भैया…कुछ ज्यादा नहीं हो रहा है…इतनी तारीफ़ तो आज तक किसी ने की न मेरी…न पति ने और न ही सासु माँ यानि मेरी मम्मी जी ने…माँ-पापा ने भी नहीं की, जितनी आप कर रहे हो…क्या चक्कर है? जरा बताइए तो सही…

नवीन-देखो भाभी, आपके मम्मी-पापा से तो मैं मिला नहीं लेकिन पक्का बताती हूँ कि आंटी दिल से आपको बहुत प्यार करती हैं…कल कह रही थीं कि बहू के बिना घर सूना-सूना लगता है| बस एक ही कमी आपकी सामने आई अब तक उनकी नजर में…वह यह कि आप उनके सपूत संदीप बाबू को कसकर रखती हैं| बहुत डरता है बेचारा आप से…यह बात तो वह मुझे भी बता चुका है…लेकिन मैंने आंटी से कहा कि यह अच्छी बात है| पति को कसकर न रखो तो न जाने कौन-कौन से गुल खिलाने लगते हैं…भरोसा न हो तो आंटी से ही पूछ लो…

मम्मी-कमरे से ही…बात में तो दम है तुम्हारे नवीन…

नेहा-अच्छा…आने दो भैया…अभी हिसाब-किताब कर लेती हूँ…

संदीप-(कमरे से ही आवाज देकर) अरे नेहा बेबी, नाश्ता तैयार है या नहीं| मुझे दफ्तर जल्दी जाना है यार| मम्मी, नवीन को भी बुला लो| सब एक साथ नाश्ता कर लेंगे| ठीक रहेगा|

नेहा-हाँ-हाँ, अब तुम आ जाओ| नवीन भैया आ गए हैं| मम्मी जी भी आ रही हैं…केवल तुम्हारी कमी रह गई है…

संदीप-दैट्स ग्रेट| शर्तिया इट विल बी सो टेस्टी ब्रेकफास्ट बेबी| तुम्हें गले लगाने का मन कर रहा है| नेहा की ओर बढ़े ही थे…कि आवाज आई

मम्मी-नेहा बेटा, संदीप आया या नहीं..

नेहा-आ गए मम्मी जी…आपके लाडले| बहुत भूखे हैं| आप भी आ जाओ फिर सब शुरू करते हैं|

मम्मी-आई बेटा…अरे खुशबू तो बहुत बढ़िया आ रही है..चलो प्लेट उठाओ भाई…और नवीन..रात वाले पराठे खा लिए थे तुमने पेटू कहीं के…

नवीन-हाँ, आंटी, आपकी संगत का असर था…रात भूख लग ही गई| ठण्डे पराठे और आम के अचार का जो स्वाद आया न आंटी…कसम खुदा की होटल ताज वाले भी वह स्वाद लाकर नहीं दे सकते| मैंने तो खाया और फिर पेट पर हाथ फेरकर सो गया…

मम्मी-नेहा, संदीप तुम भी बैठो| नाश्ता करो|

सभी नाश्ता कर चुके हैं|

संदीप-नवीन भाई, आपको चलना है या यहीं पड़े रहने का इरादा है| चलना है तो फट चल पड़ो| छोड़ दूँगा नहीं तो बजाना घंटी…

नवीन-भाई, दो मिनट में आया…

(नवीन, संदीप घर से निकल पड़े हैं…दरवाजे पर घंटी बजी…)

सीन सात

नेहा-आओ महारानी, कहाँ गायब थी| कल शाम भी नहीं आई और आज सुबह भी…इस बार काटूँगी पैसे तब तुम्हें समझ में आएगा…तुम्हें लगता है पैसे पेड़ पर उगते हैं न| नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है| संदीप बेचारा बहुत मुश्किलों से पैसे कमाता है और उसी में से मैं तुम्हें भी देती हूँ| समझी की नहीं रम्मो…ध्यान रखना, यह बात ठीक नहीं है| सुबह से काम करते-करते कमर टेढ़ी हो गई, दैया रे दैया…देखो कैसी बेशर्म की तरह मुस्कुरा रही है रम्मो…कुछ बोलोगी भी कि ऐसे ही गाय बनी खड़ी रहोगी…

रम्मो-अरे दीदी, जब तुम चुप हो तब तो बोलीं…तुम तो बड़-बड़ शुरू हौ…कैसे बोलूँ मैं…

नेहा-बोलो-बोलो…अब चुप ही तो हैं..अभी बना दोगी कोई बढ़िया सा बहाना…बुआ की बहू मर गई थी या फिर तुम्हारे चचेरे भाई की सास ने अकस्मात् दुनिया छोड़ दी…या तुम्हें कल शाम ही बुखार आया और सुबह भाग गया…ई बुखार न हो गया, मेहमान हुआ..जो शाम आया और सुबह निकल पड़ा…

रम्मो-ऐसा कुछ नहीं है दीदी…वु बात कुछ अइस है कि इनका तबीयत कुछ ज्यादा खराब रही…दवाई, खिलाई, पिलाई में रात दुई बजि गे…तब सोएन…भोर मा आँख देर से खुली…देखेन लरिकवा बोखार से तपत रहा…अब आपै बताओ…का करतेन…लरिका का लई के अस्पताल गएन…हुआँ इत्ती भीड़ रही कि का बताई दीदी…दुई घंटा में तो परचा बनवावे में लगी गय| फिर डॉक्टर बाबू तक पहुंचेन| बड़ी भीड़ रही| दवाई लेके चार बजे लौटेन घरे…शरीर थक गवा रहा…बाप-बेटा केर दवाई खवाएन फिर छह बजे दुई रोटी बनावा…नमक-पियाज से खाई के सोई गएँ| अइस सोएन घोड़ा बेचिके दीदी..आप सोच नाही सकतियु…रात मा ये बोखारे मा उठे…रोटी बनाय लिहिन…बेटवा केर साथ खाय पी…अपना दवाई खाय लिहिन, बेटवा का ख्वाइन…हमरे लिए रखी दिहिन…यत्ता सब घर मा होई गवा अउर हमार आँख नाहीं खुली| सीधे भोरेन में उठेन| जल्दी-जल्दी घर केर काम ख़त्म किया और हम आपकेर पास हाजिर…

नेहा- अब दोनों ठीक हैं…या वैसे छोड़कर आ गई हो|

रम्मो-बोखार तो बाप-बेटवा, दुनों का है…लेकिन का करी दीदी…आपकेर कामो तो जरुरी है…हम जानित है कि दीदी हमरे सहारे रहतीं हैं…आपकेर तकलीफ मा हम नाहीं देखा चाहित दीदी…आप नाहीं जनतियु…हमरी नजर मा आपकेर का महत्व है…

नेहा-अच्छा चलो…समझ गए…अब आ गई हो तो फटाफट काम ख़त्म कर लो और जाओ घर…ख्याल रखो पति-बच्चे का…कोई जरूरत हो तो बता देना..जब तक सब ठीक न हो जाएँ तब तक केवल सुबह आओ…और हाँ, जैसे ठीक हो जाएँ फिर कोई बहाना नहीं चलेगा…

रम्मो-जी दीदी…अब काम करे दीन जाए…जल्दी ख़त्म होए, तबै तौ जाबै घरे…

नेहा-हाँ, फटाफट ख़त्म करो…मैं बाथरूम में हूँ…

बाथरूम में घुसते ही नेहा बडबड शुरू…ये संदीप भी न…आने दो…आज शाम के बाद अपने बाथरूम में घुसने नहीं दूँगी…अजब हाल बनाकर रखा है बन्दे ने…बाथरूम इस्तेमाल करने का सउर तो इसे है ही नहीं…

आवाज सुनकर रम्मो बाथरूम के दरवाजे पर पहुँच गई…

रम्मो…का हुआ दीदी…

नेहा-कुछ नहीं रम्मो…ये संदीप अजीब आदमी है…बाथरूम मैं साफ़ करती हूँ…बंदा घुसा नहीं कि गन्दगी करके ही निकलता है…अब तुम्हीं देखो…साबुन पर कितने बाल चिपके हुए हैं…शैम्पू की शीशी खुली पड़ी है…मिरर का हाल और बुरा करके रखा है बन्दे ने…बेसिन मैंने कल ही साफ़ की थी…पर देखो…जैसे लगता है महीनों से किसी ने हाथ ही नहीं लगाया है…

रम्मो-साबुन से एक बाल उठाते हुए…दीदी…पर, भैया के बाल इत्ते बड़े तो हैं नहीं…

नेहा-हाँ, भैया की चमची…तुमने नापे हैं उनके बाल…कि मैंने…बन्दे के बाल थोड़े घुंघराले हैं न…जब निकलते हैं तो बड़े ही होते हैं…मलिच्छ हैं ये तुम्हारे भैया…अब मैं घंटे भर पहले बाथरूम साफ़ करूँ फिर आगे काम बढ़ेगा…आज खैर नहीं है इनकी…टावेल कहीं, कमीज कहीं, साबुन-तेल कहीं…बुरा हाल करके रखा है श्रीमान जी ने बाथरूम से लेकर बेडरूम तक का…कुछ कहो तो माँ का लाडला मम्मी जी की गोद पहुँच जाता है…रोता है..बिलखता है…मेरी शिकायत करता है…

रम्मो-दीदी, लाओ मैं कर देती हूँ…आप आराम से बैठो…थोड़ी देर…काम करके थक चुकी हो इसलिए गुस्सा कुछ ज्यादा आ रहा है…नहीं तो भैया के बारे में आपके मुँह से ऐसा मैंने तो कभी सुना नहीं…सब गलती मेरी है..न लरिका और ये बीमार होते, न दीदी का इतना काम करे के परत…न ही भैया केर बुराई हम सुनतेन…हे भगवान! हमरे परिवार केर ठीक करो जल्दी से, हम संदीप भैया केर बुराई नाही सुनि पाइत, चाहे दीदी करें या मम्मी जी…बेचारे संदीप भैया…दिन भर मेहनत करत हैं, तब दुई पइसा आवत है..घर चलत है…अउर हमारो..घर तो हियाँ से चलत है…

नेहा-भैया की चमची…काम ख़त्म करो…जाकर बच्चे और पति को देखो…भैया के प्यार में खोने की जरूरत नहीं है…मैं काफी हूँ…उन्हें प्यार और नफरत करने के लिए…

रम्मो-जी दीदी…बस आधा घंटा दो और काम ख़त्म…अउर हाँ, हम भैया के प्यार में खोइब दीदी…लेकिन उ वाला प्यार नाही…जउन आप कहा जात है…आपन प्यार तो सच्चा है…बिल्कुल 16 आना सच्चा…भाई-बहिन वाला…आपकेर ध्यान है जब भैया राखी पर हमसे राखी बंधवाइन रहा और अउर आपै साड़ी दिहीयू रहा….

नेहा बाथरूम चली गई…रम्मो ने रफ़्तार से काम शुरू किया…

रम्मो-ई बड़े लोगन केर चोचला हम तो समझ नाही पाइत| सबै डेरात हैं कि पति कहीं मचल न जाए| हिया, पति केर हिम्मत नाही…इतना कसकेर रखा है कि तनिको इधर उधर होवे केर हिम्मत नाही….अरे भाई, प्यार, तकरार, फटकार सबकेर अइस तालमेल करो कि पति कहीं जाबे न करे…अउर जाए तौ इत्ती पकड़ होए कि पति का लाइन पर लावे केर रास्ता पता होए…

अपने सिर में ही चपत लगाते हुए रम्मो कहती है…

अरे रम्मो तुम काहे चिंता करने लगी| तुम्हें तो झाड़ू, पोछा, बर्तन ही करेके है…तो कर अउर निकल ले अगले घर…

बारी उमर लरिकैयाँ गवनवा हम नाही जइब….

कउनो जतन करो सइया, गवनवा हम नाही जइब….

रम्मो यही गाना गाये जा रही थी..काम किए जा रही थी…

(नेहा बाथरूम से बाहर आ चुकी है…और देख-सुन रही है लेकिन रम्मो अपनी धुन में मस्त)

नेहा-अरे बड़ा मस्त गाना चल रहा है रे रम्मो तेरा…

रम्मो-अरे नहीं दीदी, कहाँ मस्त, वो तो मन का भरम है…आपकेर| हम तो खाली अइस गुनगुनात रहेन…

नेहा-अच्छा ये बताओ…कॉलोनी का हाल तुमने बहुत दिन से नहीं बताया…क्या चल रहा है आजकल…

रम्मो-अरे दीदी, मत पूछो…आजकल टीवी सीरियल बेकार हव…हाँ, उ शर्मा साहेब हैं न…बुजुर्ग बेचारे…आंटी जब तक रहीं, सब ठीक रहा…जब से वे भगवान केर पास गई हैं…शर्मा अंकल केर बुरा हाल हाल है…दीदी न पूछो…उन केर बहुरिया..बहुत सतावत है…न समय से चाय न खाना…छि-छि…हमें तो बहुत गुस्सा आवे दीदी…

नेहा…अरे तू तो गंभीर हो गई रे रम्मो…और वो पाण्डेय जी के यहाँ…सास-बहू का क्या चल रहा है…

रम्मो-उनके इहाँ तो कामेडी, ड्रामा, सस्पेंस सब एक साथे चलत है…सास-बहू केर लड़ाई देख लो दीदी तो चूहा-बिल्ली, सांप-नेवला भूल जावा जाई…बहुत बुरा हाल है दीदी…कबहूँ सब कुछ देखि केर हंसी आवत है तो कबहूँ बहुत दुःख| पर, का करी, हम खाली देख सकत हैं…पर, अच्छी बात ई है दीदी कि सब कुछ जुबानी ही है…

मम्मी-नेहा बिटिया, जरा मेरे पास तो आओ..

नेहा…आई मम्मी जी…

मम्मी…जब कोई बाहर का आदमी आए तो घर में शान्ति होनी चाहिए…तुम मियाँ-बीवी बहुत लड़ते हो| बेटा…सन्देश ख़राब जाता है| घर-परिवार की बदनामी होती है| तुम कल शाम को भी जरा सी बात पर संदीप पर बिगड़ रही थी किचेन में…मैं सब सुन पा रही थी तो सोचो भला नवीन ने भी तो सुना ही होगा…

नेहा…क्या करूँ मम्मी जी…ये आपका लाडला कभी भी शुरू हो जाता है| गड़बड़ी करने का जैसे सारा ठेका अकेले इसी बंदे के पास है…ऐसे में गुस्सा आ जाती है…मैं ध्यान रखूंगी मम्मी जी…लेकिन आप अपने लाडले का पक्ष ज्यादा लेती हैं…थोड़ा सा मेरा भी लिया करिए…आखिर मैं भी तो आपकी बेटी ही हूँ…

मम्मी…इसका सर्टिफिकेट देना पड़ेगा क्या मुझे? तू बेटी तो है ही मेरी| जब मैं संदीप से बात करती हूँ तो उसे तुम्हारा ख्याल रखने के लिए ही कहती रहती हूँ| कई बार बेचारा पिट भी जाता है मेरे हाथों से…मैं नजर रखती हूँ सभी चीजों पर…रात में क्यों चिल्ला रहा था..संदीप ?

नेहा…अरे मम्मी, वो बुरा वाला सपना देखा था आपके लाडले ने…एक बार देखा कि मैं नाराज होकर मायके जा रही हूँ…बेचारे ने मनाकर मुझे वापस बुलाया….तनिक देर बाद फिर चीखकर उठा…मैं बाथरूम में थी…नेहा…नेहा…आवाज सुनकर मैं आई तो बड़ी मुश्किल से बताया कि मैं कमरे की खिड़की से लटक गई थी…यह कहकर नेहा हंसने लगी…

मम्मी…खुद को भी संम्भालो और संदीप को भी…मुझे लगता है कि वह तुमसे डरने सा लगा है| इस तरह के उलजुलूल सपने इसीलिए आते हैं…

नेहा…आपके कहने का मतलब मैं जिम्मेदार हूँ इन सब चीजों के लिए…नॉट फेयर मम्मी जी…आपका यह बेटे के प्रति एकतरफा प्यार है…बहू आपके लिए कोई मायने नहीं रखती…और बेटा सब कुछ…

मम्मी…अच्छा जाओ आराम करो…सुबह से काम करते हुए थक गई होगी…मेरे लिए तुम दोनों बराबर हो…कभी तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारे साथ कोई अन्याय किया…मैं ऐसी वाली सास नहीं हूँ न ही कोई इरादा रखती हूँ..मेरी सास ने मुझे बहुत नाजों से रखा था…इसलिए मैं अपनी बहू के साथ कोई गड़बड़ नहीं करने वाली…

नेहा…जी मम्मी जी…जा रही हूँ| कोई जरूरत होगी तो आवाज दीजिएगा| पानी आपके लिए रख दिया है|

नेहा…अरे रम्मो, तुम्हारा काम ख़त्म हुआ कि नहीं…

रम्मो-जी दीदी, ख़त्म ही समझो…बस तनिक पोछा बाकी है…बालकनी में..

नेहा-बाकी सब हो गया…

रम्मो-हाँ, दी…

नेहा…जरा यहाँ आओ…देखो…ये वाला कोना छोड़ दिया तुमने…उधर भी तो गंदगी दिख रही है| और कूड़ा दरवाजे पर ही फेंक दिया| आजकल स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है| सफाई का ध्यान रखने के लिए तो हमें स्कूल से लेकर घर तक में सिखाया गया है और तुम हो कि झाड़ू मारी और सीधे कूड़ा सडक पर| कसम खाओ कि ऐसा नहीं करोगी| वैसे भी मैं देख रही हूँ आजकल तुम्हारा मन काम में लगता नहीं है…मैं सब समझ रही हूँ…काम नहीं था तो दीदी की सारी शर्तें मंजूर थीं…अब काम ज्यादा पकड़ लिया है तो केवल लप्पो-झप्पो और काम में सब गड़बड़…ठीक नहीं रम्मो…समझ लेना…

रम्मो-दीदी भरोसा करो, ये लो इधर भी साफ़ कर दिया और उधर भी…अब खुश हो जाओ| आपकेर चेहरे पर हम खाली ख़ुशी देखा चाहित है…आपकेर चेहरे पर मुस्कान देखित है न तो हमार खून बढ़ी जात है…

नेहा..फिर शुरू हो गई तुम्हारी बातें…और ये कभी ख़त्म भी नहीं होने वालीं…अब जाओ, पति-बेटे का ख्याल रखो…

रम्मो-जी दीदी…जाती हूँ…आप भी आराम कर लो…

(नेहा आराम करती है| उसे नींद आ जाती है| दरवाजे की घंटी बजती है| मम्मी जी दरवाजा खोलती हैं| सामने संदीप…उदास चेहरा लिए खड़ा मिला|)

माँ…अरे तुम इतना जल्दी आ गए बेटा…तबीयत तो ठीक है…तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?

संदीप-माँ, मैं बहुत थका हूँ…तनिक आराम कर लेने दो, फिर सब बताता हूँ…

माँ…नहीं मुझे अभी जानना है…नेहा! जरा इधर तो आना बेटा…देखो संदीप को क्या हुआ? कुछ बोल ही नहीं रहा है…

नेहा…आई मम्मी जी…

नेहा हाथ में पानी का ग्लास लेकर आई…

नेहा…अरे संदीप, तुम आ गए…इतनी जल्दी…सब ठीक तो है| कुछ बोलो तो बाबा…तुम ऐसे अच्छे नहीं लगते…मुझे मेरा उछलता-कूदता संदीप चाहिए…

संदीप गुस्से से लाल हो जाता है…और चीखकर कहता है…उछलता-कूदता संदीप चाहिए…खो गया वह संदीप कहीं तुम्हारी घर-गृहस्थी के चक्कर में…दफ्तर में बॉस की सुनते हुए, घर में कभी माँ की तो कभी बीवी की सुनते हुए…अब वह संदीप नहीं मिलने वाला…मत ढूढों उस संदीप को…तुम्हारे चक्कर में ही खो गया है…अरे क्या नहीं किया इस घर के लिए, तुम्हारे लिए…मम्मी के लिए…केवल तुम सबकी सुनता रहा आजतक| तुमने जो कहा, चुपचाप सुनता रहा| ढेरों गलत बात इसलिए बर्दाश्त करता रहा कि घर में शांति बनी रहे लेकिन किसी को मेरा सुकून देखा ही कहाँ जा रहा था…अब तुम सब मेरी सुनो…ध्यान से…तुम्हारे संदीप की नौकरी चली गई…

(नेहा के हाथ से ग्लास छूटकर गिर जाता है…जोर से आवाज आती है…)

संदीप….बॉस ने इस्तीफ़ा ले लिया आज मेरा…वह भी तुम्हारे चक्कर में…तुम्हें तो अपने आगे किसी की सुननी नहीं है| जब मन आये, जो कहो, वह पूरा होना चाहिए…बस| टांग खींचने में कभी पीछे न तुम रही न ही मेरी प्यारी मम्मी…मैं ससुरा…तुम लोगों को खुश रखने के चक्कर में बर्बाद हो गया आज…20 साल से एडजस्ट ही कर रहा हूँ…लेकिन कोई खुश नहीं न बीवी, न बच्चे, न माँ और न ही बॉस…और उसी ने आज नौकरी ले ली…अब खुश हो जाओ| घर में ही रहूँगा| तुम्हारी सेवा करूँगा…ठीक है न| अब खुश रहना| बस|

एकदम सन्नाटा छा गया घर में…

फिर मम्मी ने माहौल का हल्का करने का प्रयास किया….

माँ-अरे पगले तुमने तो डरा ही दिया था…बस इतनी सी बात पर इतना हंगामा…इतनी परेशानी…सुन| अभी तेरी माँ जीवित है| और तेरे पापा की ताकत भी उनकी गैरहाजिरी में मेरे में समाई हुई है| तुम्हें बिल्कुल चिंता नहीं करनी है| उठो| बाथरूम जाओ| मुँह पर पानी मारो| नेहा…लेकर जाओ इसे बाथरूम| मुँह धुलाकर ले आओ…चाय बना लो…ये तो अच्छा हुआ बच्चे घर में नहीं थे, नहीं तो बाप को इस हाल में देख बेचारे परेशान ही हो जाते…

नेहा…जी मम्मी जी|

नेहा संदीप को उठाकर बाथरूम ले जाने का प्रयास करती है और संदीप उसे झिड़क देता है…

नेहा…अरे बाबा गलती हो गई, माफ़ कर दो…लेकिन तुमसे आखिर ऐसी कौन सी गलती हो गई तुमसे…जो बॉस ने नौकरी खा ली…

संदीप…आपही हैं मोहतरम इसके पीछे| कल शाम जब मैं काम कर रहा था…तो आप अचानक भड़क गई थी| याद है कुछ आपको! आपके गुस्से को शांत करने के चक्कर में मैं बाजार चला गया यह मानकर कि रात में काम पूरा कर लूँगा लेकिन नवीन आ गया…झूठ तो मैंने उससे भी बोल दिया था लेकिन बाजार में धर लिया उसने..फिर रात की दुर्गति में भी तो आपकी भरपूर भूमिका रही| सुबह जल्दी-जल्दी दफ्तर पहुंचा| जैसे-तैसे काम पूरा किया| बॉस के सेक्रेटरी को सौंपकर मार्किट चला गया…उन जनाब ने कागज दाब लिया| वापस जैसे ही दफ्तर पहुँचा बॉस ने तलब कर लिया… वहाँ पहुँचा तो मेरे सामने सीधा इस्तीफ़ा रख दिया और दस्तखत करने को कहा| मैंने दस्तखत किया…उन्होंने कहा..नाउ यू कैन गो…

नेहा…सॉरी संदीप| सब मेरी वजह से हुआ है…न मैं जिद करती न ही गड़बड़ होती….लेकिन ये बताओ कि बॉस के सेक्रेटरी ने तुम्हारा कागज दिया क्यों नहीं उन्हें…तुम्हारे इस्तीफे के समय वह कहाँ था…तुमने बॉस को बताया क्यों नहीं कि तुम अपना काम समय से पूरा करके ही मार्किट गए थे| कोई ऐसा कैसे कर सकता है…

संदीप… जब यह हादसा हुआ, केबिन में केवल मैं और बॉस ही थे…सेक्रेटरी न जाने कहाँ गायब था उस समय…मुझे तो उन्होंने कुछ कहने का मौका तक नहीं दिया…जैसे मैं बोलने की कोशिश करता…वे चुप करा देते और सिर्फ दस्तखत करने को कहते…क्या करता…मज़बूरी में दस्तखत किया और फिर बिना किसी से कुछ कहे, मिले मैं वापस सीधे घर आ गया…अरे कुर्सी पर बैठने तक का ऑफर नहीं दिया…सभी बातें खड़े-खड़े हुईं…

नेहा…अच्छा परेशान न हो…मैं तुम्हारे साथ हूँ…मम्मी जी हमारे साथ हैं| हम मिलकर इस समस्या का निदान निकाल लेंगे| हम सब बड़ी से बड़ी समस्या से जूझ सकते हैं…चलो मम्मी के पास चलते हैं…

संदीप…पर कैसे नेहा? नौकरी रहते हुए दूसरी नौकरी मिल जाती है| न होने पर आसानी से नहीं मिलती…बाजार में मंदी है| नौकरियां जा रही हैं| सीनियर्स के लिए वैसे भी मुश्किल होती है| आसान नहीं है यह सब|

नेहा-संदीप मम्मी के पास आ जाते हैं…

मम्मी…बेटा परेशान न हो…कल बॉस के पास फिर से जाना…मेरा मन कहता है कि वे तुम्हारी सुनेंगे भी और इस्तीफ़ा भी वापस लेंगे| कई बार गुस्से में ऐसा हो जाता है| एक बार तुम्हारे पापा ने अपने एक साथी के साथ एकदम ऐसा ही किया था| शाम को घर आए तो पूरा घटनाक्रम बताया भी मुझसे और यह भो बोले कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था…मौका तो देना ही था…चाय पीने के बाद बोले मैं अभी आता हूँ…चले गए सीधे उसके घर…वहाँ का माहौल निश्चित ठीक नहीं था…झूठी मुस्कान से सभी ने स्वागत किया…और असली मुस्कान लिए सबने विदा किया…क्योंकि तुम्हारे पापा ने उसे वापस नौकरी पर बुला लिया था…मुझे तो सिर्फ उसी घटना का दोहराव लगता है…वो कहते हैं न कि सब कुछ यहीं मिलता है…मेरा सुझाव मानो| चाय पियो| तुम दोनों मंदिर जाओ…या चलो मैं भी चलूंगी…मेरा विश्वास है कि तुम्हें यही नौकरी वापस मिलेगी…

संदीप…घुटनों के बल बैठ जाता है…दोनों हाथ ऊपर उठाकर ऊपर वाले से कुछ कहता है…

हे भगवान! हे देवी माँ! हे बजरंगबली! हे बरमबाबा! हे कालीमाई! हे बांकेबिहारी प्रभु श्रीकृष्ण!  अब आप ही लोग मेरा बेड़ा पार करो…मैंने तो अपना सब कुछ लुटा दिया दो वक्त की रोटी के लिए…माँ से झगड़ा, बीवी से लड़ा, बच्चों को उनका हक नहीं दे पाया..दिन-रात दफ्तर के बारे में सोचते, वहीँ का काम करते हुए 18 बरस हो गए…और आज क्या सिला मिला? आप ही देखो…हिटलर बॉस ने क्या किया? पहले से ही इस्तीफ़ा तैयार रखा था साहब बहादुर ने| नौकरी अगर किसी की लेनी थी तो मुझसे पहले अपने पीए की खाते, मेरी क्यों खा ली? मेरा तो इस क्रूर कार्पोरेट से मन ही भर गया| हे प्रभु! लोग कहते हैं न, आप जो करते हो, अच्छे के लिए करते हो…मुझे बताओ, अब क्या अच्छा होने वाला है?

(यह बातचीत चल ही रही थी कि दरवाजे की घंटी फिर बजी…नेहा…ने दरवाजा खोला…सामने संदीप के बॉस को देख वह चौंक गई…)

विक्रम…मैं अंदर आ सकता हूँ नेहा…

नेहा…जी सर, आइए न प्लीज

मम्मी जी…नेहा बिटिया कौन आया है…रम्मो तो नहीं है…

(नेहा, विक्रम को लेकर कमरे में दाखिल होती है…)

विक्रम को देखकर संदीप अवाक…

संदीप…सर..आप?

विक्रम…हाँ, मैं ही…असल में जिस चीज की सजा मैंने तुम्हें सुनाई, उसका हकदार तो मेरा सेक्रटरी है…तुमने काम पूरा करके दे दिया…लेकिन उसने मुझे दिया ही नहीं…इस वजह से हेड आफिस से मुझे फटकार पड़ी| मुझे जिम्मेदारी तो तय ही करनी थी| मैंने तुम्हें जिम्मेदार मान लिया| मैंने अपने बॉस का गुस्सा तुम पर उतार दिया इस्तीफे के रूप में…मैं अपनी गलती का प्रायश्चित करने के लिए ही तुम्हारे सामने हूँ| ये रहा तुम्हारा इस्तीफा| इसे फाड़ कर फेंक दो..कल से काम पर लग जाओ…और हाँ इसकी भरपाई अगले महीने तुम्हारे प्रोमोशन से होगी…उसकी मिठाई अभी खिलाओ एडवांस में…एक और जरुरी बात…तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुमने काम पूरा कर लिया था?

संदीप…सर, उस समय आपने मेरी कुछ सुनी कहाँ? आप के सिर पर तो कुछ और ही सवार था| आप ध्यान दीजिए…तीन कोशिश मैंने की आपसे कुछ कहने की लेकिन आपने तवज्जो नहीं दी सर और मैं दस्तखत करने को विवश था…

विक्रम-देखो…अपनी बात रखना आना ही चाहिए…तुम्हें, अगर आप अन्याय बर्दाश्त कर रहे हैं तो यह भी अन्याय करने के सामान है| तुम्हारी यह गलती थी| आगे तुम्हारे जीवन में कभी भी कोई ऐसी बात हो तो ध्यान रखना, बिना अपनी बात कहे कदम आगे नहीं बढ़ाना| तुम रुके भी नहीं…दफ्तर में…

नेहा…दौड़कर मिठाई लाती है…विक्रम को खिलाती है…नेहा…मम्मी जी के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं…फिर मम्मी जी बेटे-बहू को गले लगा लेती हैं…और विक्रम से कहती हैं…कि बेटा, तुम तीनों को मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रही हूँ…गुस्से में किया गया काम हमेशा गलत होता है…ऐसे में खूब सोच विचार कर फैसला लो चाहे घर हो या बाहर..बीवी-बच्चे हों या कर्मचारी…हर मामले में गुस्सा घातक है…जो बात मिल जुलकर प्यार-मोहब्बत से रहने में है…वह झगड़ा-झंझट में बिल्कुल नहीं…

विक्रम-आंटी, आगे से ध्यान रखूंगा…पहले यह गलती सुधारने का मौका तो मिले…संदीप, कल समय से दफ्तर पहुँचना होगा तुम्हें भी और मुझे भी…अच्छा नेहा, आंटी जी, चलते हैं, इजाजत दीजिए…प्रणाम…

संदीप…विक्रम को छोड़ने के लिए दरवाजे की तरफ बढ़ता है…

विक्रम…ठीक है संदीप…सॉरी आज हुई तकलीफ के लिए…यह हमारे लिए भी सीख है…अब चलते हैं और हाँ कल मुलाकात होगी…

संदीप…लम्बी सांस लेता है और कहता है…

नहीं बॉस…अब नहीं…बहुत हो गई नौकरी-चाकरी…

लेखक-दिनेश पाठक