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उम्मीद
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उम्मीद 44 : टीना से दिल की बात कहकर मन ही मन खुश हुआ मनीष

मनीष और टीना अच्छे दोस्त हो चुके थे| फोन पर बातें करना दोनों को अच्छा लगता है| वैसे भी इंडिया से दूर कोई भी अपना दिखता है तो प्यार स्वाभाविक है| और ये दोनों बच्चे तो पहले से ही एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं| क्योंकि इन दोनों के पापा दोस्त हैं| भगनानी के लंदन में होने की वजह से ही मिस्टर अरोरा ने टीना को वहाँ भेजने की हिम्मत जुटा ली थी अन्यथा संभव था कि टीना देश में ही कहीं पढ़ाई कर रही होती|

हास्टल से छुट्टी का मतलब ही होता कि टीना भगनानी अंकल के घर मिलेगी, यह बात उसके क्लास मेट भी जान चुके थे| मनीष भी कभी न कभी माँ के हाथ की बनी खान-पान की चीजें देने हास्टल पहुँच जाता था| इसीलिए जब पापा ने दोनों को होटल जाकर सामान लाने को कहा तो दोनों ख़ुशी-ख़ुशी राजी हो गए| हालाँकि, टीना के हाथ में प्लास्टर लगा हुआ था फिर भी दोनों घर से होटल की ओर रवाना हुए| वहां कमरे में पहुंचकर सामान समेटते हुए मनीष ने कहा कि टीना एक बात बताओ? टीना ने कहा-क्या? वह बोला-मुझे क्यों ऐसा लगता है कि हमारा जन्म-जन्म का कोई रिश्ता है| क्यों तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो|

तुम्हारे पास होने से मेरे मन को सुकून क्यों मिलता है? और अंतिम सवाल यह कि क्या तुम भी ऐसा कुछ महसूस करती हो? टीना ने कहा-हाँ, तुम्हारा साथ मुझे अच्छा लगता है ठीक उसी तरह जैसे भाई-बहन का साथ होना चाहिए| तुम जब सामने होते हो तो एक अजब सी सुरक्षा का भाव महसूस करती हूँ मैं| अच्छा-मनीष ने कहा लेकिन मन ही मन कुढ़ने लगा| बोला-हे भगवान, इस लड़की को अक्ल दो| मैं पूछ कुछ और रहा हूँ और ये जवाब कुछ और दे रही है| टीना ने पूछा मनीष तुम अचानक चुप क्यों हो गए? क्या तुम मुझसे सहमत नहीं हो| नहीं-नहीं सहमत हूँ| बस मेरी-तुम्हारी फीलिंग्स अलग अलग है| मैं तुममे एक बहुत अच्छा दोस्त देखता हूँ|

हाँ तो, बहन से अच्छा दोस्त कोई और हो सकता है क्या? अरे नहीं रे पगली| तुम समझ नहीं रही हो| वो वाली दोस्त, तकलीफ होने पर जिसकी गोद में सर रखकर राहत महसूस हो| वो वाली दोस्त, जिससे कोई भी कच्ची-पक्की कही-सुनी जा सके| अच्छा! टीना ने मनीष की आँखों में देखा और दोनों एक-दूसरे को निहारते रहे| फिर मुस्कुराए और सामान लेकर चल पड़े| मनीष को इस दिन का इन्तजार था कि वह टीना से वह सब कुछ कह दे लेकिन वक्त नहीं मिल रहा था| हास्टल में जब भी कोशिश करता तो कोई न कोई लड़की टपक पड़ती और घर में मौका नहीं मिलता क्योंकि मम्मी, पापा भी रहते|

आज होटल के कमरे में कोई डिस्टर्ब करने वाला नहीं था तो उसने मन की कह दी और उसने महसूस भी किया कि उसकी बात टीना तक पहुँच गई| क्योंकि कमरे से निकलने के पहले जी तरह टीना ने एकटक उसे निहारा, उससे मनीष को बल मिला| मन तो कर रहा था कि टीना को गले लगा ले लेकिन यह मानकर नहीं पहल की कि कहीं उसे बुरा न लग जाए| आखिर संस्कारों वाली इंडियन जो ठहरी| लेकिन कुछ देर की यह मुलाकात मनीष को एनर्जी दे गई| दोनों घर पहुँचे| बहुत खुश थे|

उधर, वहाँ भी मस्ती चल रही थी| रात काफी हो गई थी| फटाफट खाना खाया सबने और चले गए सोने| हालाँकि, दादी को नींद नहीं आ रही थी क्योंकि वे पहली दफा लंदन आईं थीं| उन्होंने सुन रखा था कि इंडिया और लंदन में दिन-रात का कुछ फासला होता है| बेटे ने भी उन्हें रास्ते में यही जानकारी दी थी| टीना आदतानुसार उन्हीं के पास सोई थी और खूब गहरी नींद सो रही थी| दादी कभी उसके चेहरे को निहारतीं तो कभी उसके हाथ की चोट देखतीं| फिर मन ही मन कहतीं कि इस मासूम को प्रभु कितनी तकलीफ दे रहे हैं|

नेकदिल है मेरी लाडो फिर भी| सबकी भलाई की बातें करती है| देश-समाज के बारे में सोचती है| परिवार की संकटमोचक के रूप में निकलकर आई है ये बच्ची| हे प्रभु! मेरी लाडो के हिस्से की दुःख-तकलीफ मुझे दे दिया करो| इसे बख्श दो| अभी उम्र ही क्या है इस मासूम की| अगर यह सिलसिला आपने बंद नहीं किया तो अंदर से टूट जाएगी| एक ही बिस्तर पर होने की वजह से टीना की आँख खुल गई| दादी बैठी हुई उसे निहार रही थीं| टीना की आँख खुली तो दादी उसे एकटक निहार रही थीं| टीना उठी और दादी के गले लगकर लिपट गई| दादी ने कहा-अरे लड़की-हाथ की चोट बढ़ जाएगी| वैसे भी रात बहुत है, अभी सो जा| बड़ी हो गई है| थोड़ा उछलकूद कम किया कर| इसी वजह से चोट लगी है तुम्हें| शैतानी तो इसके नस-नस में भरी हुई है| हे भगवान! बचाओ इसे| दादी की इस अपील पर टीना फिर उनकी गोद में सर रख दी और निहारने लगी|

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