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उम्मीद 22: रंग लाने लगा टीना का प्रयास, फैक्ट्री में काम शुरू

सुबह से भाग रही टीना थक गई थी| फैक्ट्री के लोगों के वापस जाने के बाद वह सो गई| माँ ने कोशिश की लेकिन उसने डिनर नहीं लिया| सुबह उसे जल्दी फैक्ट्री पहुँचना था लेकिन आँख देर से खुली| मम्मी या दादी ने उसे जान बूझकर जगाया भी नहीं| घड़ी में सुबह के नौ बज रहे थे|

कर्मचारियों से बातचीत में जो कुछ भी तय हुआ सब गड़बड़ हो चुकी थी| फटाफट तैयार होकर वह फैक्ट्री की ओर भागी| उसे देखते ही नारे तेज हो गए लेकिन उनमें अब वो जोश नहीं रहा| कर्मचारियों की संख्या भी कम थी| आज टीना को कारखाने में आसानी से जाने दिया गया| वह खुश हो गई, क्योंकि उसे लगने लगा कि रात की बातचीत काम कर गई| अंदर जाकर देखा तो सीन बदला हुआ था| दर्जन भर लोग अपने काम में लगे हुए थे| कोई सफाई में जुटा था तो कोई बिजली का काम कर रहा था| इन सबकी पहली कोशिश यही थी कि जल्द से जल्द फैक्ट्री को चालू हालत में किया जाए|

आन्दोलन शुरू होने से पहले इन मजदूरों को अंदर कर दिया गया था| इनके खाने-पीने की व्यवस्था भी वहीँ की गई थी| यह सारे इंतजामात रमई चाचा ने शान्ति से किए थे| वे खुद बाहर नारे भी लगा रहे थे| मजदूरों को निर्देश था कि वे शाम को ही निकलेंगे बाहर| कुछ देर बाद टीना बाहर आई और आन्दोलन कर रहे लोगों के पास पहुँच गई| सभी को अभिवादन किया और वहीँ बैठ गई| अब नारे तेज हो चले थे| नेताओं के भाषण शुरू हो गए| कुछ देर रुकने के बाद टीना वहां से निकल पड़ी| उसे लगने लगा कि चीजें काबू में आ रही हैं|

घर पहुंचकर उसने भोजन किया और सुरभि को लेकर वकील के पास पहुँच गई| पापा की जमानत के कागजात तैयार करने का अनुरोध किया| फिर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने शुरू किए इस मासूम ने| जाँच की प्रगति जानने का प्रयास किया| क्योंकि उसके दिमाग में इस समय दो ही बातें चल रही हैं| एक- कारखाना किसी भी तरह चालू हो| दो-पापा की जल्द से जल्द जमानत हो| अग्निशमन दफ्तर से निकलते हुए सुरभि ने टीना को अचानक गले लगा लिया| बोली-यार तू क्या चीज है| जहाँ जाती है, बात बन जाती है| सब तुम्हारी सुनते भी हैं| तुम्हें कोई छोटा भी नहीं मानता| टीना ने कहा-ऐसा कुछ नहीं है मेरी माँ| तुम खुद अच्छी हो| प्यार करती हो मुझे| इसलिए सब तुम्हें अच्छे दिख रहे हैं| यह बात सही है कि लोग मदद कर रहे हैं लेकिन इन्हें पता है कि इसकी कीमत मिलेगी| पापा का व्यवहार सभी से इतना बढ़िया है कि लोग उनकी बेटी की सुन रहे हैं, नहीं तो कौन सुनता हमारी|
और यह न भूलो कि मेरी ताकत मेरी दोस्त सुरभि मेरे साथ जो है साए की तरह| जरा सोचो, अगर तुम न होती तो मेरा क्या होता| ख़ुशी में, तकलीफ में, हर जगह एक तुम्हीं तो हो जो मेरा साथ दे रही हो| इम्तहान अगर मैं दे पाई तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी वजह से| अन्यथा मैंने तो ख्याल ही त्याग दिया था इस साल इम्तहान देने का| तुमने ताकत दी, सलोनी मैम ने पढ़ा दिया तो बात बन गई| अब परिणाम जो भी आए लेकिन इतना पता है कि मैं पास हो रही हूँ| नम्बर भी बहुत ख़राब नहीं आने वाले|

टीना ने रमई चाचा को फोन लगाया| घंटी तो गई लेकिन फोन उठा नहीं| कुछ देर बाद उनका फोन आया| बोले-बिटिया तुम निश्चिंत रहो| हम सब देख रहे हैं| मजदूरों ने भोजन कर लिया है| आन्दोलन भी दो-तीन दिन से ज्यादा नहीं चलने वाला| क्योंकि बाहर के जितने नेता आये हैं, वे सबके सब तुम्हारी कल की बातचीत से बहुत प्रभावित हैं| उनकी मजबूरी यह है कि आन्दोलन शुरू कर चुके हैं तो अचानक ख़त्म नहीं कर सकते| कर्मचारियों के सामने उन्हें अपनी राजनीति भी तो चमकानी है| आज आधे से ज्यादा कर्मचारी आये नहीं| जो आये भी वे कुछ देर बैठ रहे हैं फिर कहीं जा रहे हैं| इसीलिए आज का आन्दोलन बहुत धीमा है| बस तुम यह समझो कि उधर आन्दोलन ख़त्म होगा, इधर फैक्ट्री में मरम्मत का काम पूरा होगा| तब तक सेठ जी भी वापस आ जाएंगे| बजरंग बली की कृपा हम सब पर है बिटिया| अब आज इधर आने की जरूरत नहीं है| मैं देख लूँगा| कोई जरूरत हुई तो बात कर लेंगे| तुम घर जाओ, आराम करो|

टीना ने कहा-चाचा, कहाँ आराम, कैसा आराम| न तो नींद आ रही है न ही कहीं चैन मिल रहा है| घर, फैक्ट्री, सरकारी दफ्तरों और कचहरी के चक्कर में बीत रहे हैं दिन| एक बार पापा की जमानत हो जाए तो बहुत कुछ आसान हो जाएगा| मैं फ़िलहाल अस्पताल जा रही हूँ| दो दिन से गई नहीं हूँ| हाँ, यह ठीक रहेगा बेटा| आप अस्पताल हो आओ| लोगों को अच्छा लगेगा| जी चाचा-टीना ने कहा| फिर सुरभि और टीना अस्पताल पहुंचे| यहाँ घायलों का इलाज चल रहा है| सबकी सेहत में तेजी से सुधार है| यहाँ भी टीना को मरीज, तीमारदार सभी का प्यार मिल रहा है| तकलीफ में भी सब उसके दीवाने हैं| डॉक्टरों, मरीजों से मिलने के बाद टीना ने तीमारदारों को खोजा| सब एक साथ भोजन कर रहे थे| टीना ने कहा-अरे वाह| क्या खुशबू है| तभी आवाज आई-हाँ बिटिया, आप भी खा लो| नहीं अम्मा, मैं आपकी प्लेट से ही एक रोटी ले रही हूँ| मैं और सुरभि इसी से स्वाद ले लेंगे| जैसी आपकी मर्जी| प्रभु आप को खुश रखें| हम सबकी उनसे यही विनती है|

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