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उम्मीद 18 : हे भगवान! दुनिया के सभी बच्चों को दादी का प्यार देना

घर में इन दिनों लोगों का आना-जाना बढ़ गया है| टीना भी खुश है| पढ़ाई नियमित है| टीचर सलोनी और दादी की वजह से पिछले दिनों में हुए नुकसान की भरपाई तेजी से हो रही है| इस बीच टीना के ठीक होने की ख़ुशी में घर में आने-जाने वालों का सिलसिला तेज हो चला है| सभी उससे मिलना चाहते हैं| मिलते भी हैं| ज्यादातर अंकल-आंटी अपनी ज्ञान गंगा से उसे सराबोर भी करते हैं| पर, इनमें से उसकी सुनने वाला शायद ही कोई हो| चूँकि, टीना इंटर में है ऐसे में उसके आगे के भविष्य पर चर्चा आम हो चली है| यह लगातार हो रहा है|

कोई उसे एक बेटी के रास्ते पर चलने का सुझाव दे रहा है तो दूसरा अपने बेटे का उदाहरण देता है| जबकि टीना हर हाल में यह फैसला खुद से करने वाली है| ऐसे में अंकल-आंटी की बातें कई बार उसे उलझन में भी डाल रही हैं| वह परेशानी महसूस कर रही है| कई बार ऐसा लगता है कि उसकी बोर्ड्स की तैयारियों पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है| लगातार चल रही इन चीजों पर टीना ने दादी से मदद माँगी और मम्मी-पापा से बात करने का फैसला किया| शाम को डाइनिंग टेबल पर परिवार बैठा तो इस मसले पर तयशुदा कार्यक्रम के तहत चर्चा शुरू हुई| दादी ने टीना के मम्मी-पापा यानी अपने बेटे-बहू से एक सवाल पूछा-तुम दोनों जब इंटर में थे तो आगे की पढ़ाई क्या होगी, कैसे होगी, यह किसने तय किया था? तुमने, तुम्हारे मम्मी-पापा ने या पड़ोसियों ने? दोनों एक साथ बोल पड़े-आज अचानक मम्मी को हमारे बचपन की याद कहाँ से आ गई? दादी ने कहा-याद तो तब करना पड़ता है जब कुछ भूला हो| यहाँ तो सब सिनेमा की तरह आँखों के सामने चलता ही रहता है| फिर दादी ने टीना की परेशानी साझा कर दी और अपेक्षा की कि इस समय प्रयास यह हो कि घर में दोस्तों का आना जाना कम हो और अगर इसे रोका नहीं जा सकता है तो सभी से टीना को मिलवाने की जरूरत नहीं है| यह उसके इम्तहान की तैयारियों का समय है| बाधा पहुँचती है|

मम्मी-पापा को समझ आ गया| उन्होंने वायदा किया कि आगे से ऐसा नहीं होगा| हम सब इसका ख्याल रखेंगे| हाँ, यह उचित होगा| भविष्य में उसकी पढ़ाई का फैसला उसे ही करने दिया जाए| बेवजह का दबाव बनाकर कुछ भी करने को उसे विवश करना उचित नहीं है| क्या फर्क पड़ता है कि शर्मा जी की बेटी या दुबे जी का बेटा क्या कर रहा है? और यह कतई जरुरी नहीं है कि वो बच्चे जो कर रहे हों उसे हमारी टीना भी करे| इस मुद्दे पर हम जो भी बात करेंगे, यहीं करेंगे| आपस में करेंगे और वह भी तब जब टीना का फ्री टाइम होगा| तुम जब इंटर में थे तो तब तुम्हें पता था कि आगे चलकर उद्योगपति बनोगे? नहीं पता था न तो ये तुम्हारे यार-दोस्त हमारी मासूम का पल-पल इम्तहान क्यों लेते रहते हैं? हमने तुम पर कोई दबाव बनाया था? नहीं न! फिर भी तुम्हारी पढ़ाई पूरी हुई और करियर भी ठीक से शुरू हुआ| नौकरी छोड़कर जब इंडस्ट्री लगाने का फैसला किया था तुमने, तब भी किसी ने नहीं रोका था? दादी ने ये सारे सवाल अपने बेटे यानी टीना के पापा से एक साथ पूछ लिए| फिर बोलीं-मैं जानती हूँ कि समय बदल गया है| बच्चों को मार्गदर्शन देना हमारी पहली जिम्मेदारी है| जरा सोचो-बच्ची चौराहे पर किसी से रास्ता पूछे और एक साथ कई लोग अलग-अलग रास्ता बताने लगें तो क्या होगा? बच्ची कन्फ्यूज ही तो होगी!

अब समय इस बात की इजाजत नहीं देता| उचित यही होगा कि हम उसे पढने की आजादी दें| पढ़ाई जरुरी है| ज्ञान जरुरी है| हर बच्चे की अपनी क्षमता है| उसे उसकी सुनने देने में हमारा कुछ नहीं जाता| जरूरत पड़ने पर हम किसी विशेषज्ञ से मिलेंगे, टीना को मिलवायेंगे| लेकिन सबसे पहले उसकी सुनेंगे| हम अपनी बच्ची की तुलना किसी से नहीं कर सकते| इस दुनिया में आने वाला हर बच्चा स्पेशल है| बस हमें इतनी पहचान करनी है कि उसकी रूचि किस चीज में है| वह क्या करना चाहता है या चाहती है? रूचि के मुताबिक अगर हम उसे सुविधा-संसाधन दे देंगे तो वह खुद-ब-खुद रास्ता बनाने में सक्षम है| बात करते हुए सभी ने कुछ ज्यादा ही खाना खा लिया| सब डाइनिंग से इसी सहमति के साथ उठे कि इम्तहान तक घर में कोई पार्टी नहीं होगी| घर में माहौल सामान्य रखा जाएगा| और टीना वही पढ़ेगी जो उसका दिल करेगा| सब अपने-अपने कमरे में चले गए| टीना अब खुश थी| उसके सिर से बहुत सारा बोझ दादी ने हल्का कर दिया था| टीना ने कहा-हे भगवान! सभी बच्चों को मेरी ही तरह दादी देना| क्या जादू है यार दादी में| जब बोलना शुरू करती हैं तो मम्मी-पापा की तो घिग्घी बंध जाती है और हमारी समस्याएँ क्षण भर में छूमंतर हो जाती हैं| चार महीने से मैं देखा रही हूँ| दादी के रहने से मेरा सब कुछ अच्छा हुआ है| घर में सभी को लाभ मिला है| दादी तुस्सी ग्रेट हो, कहकर टीना लिपट गई|

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