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उम्मीद
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उम्मीद 17 : टीचर सलोनी, दादी और उनके देशी नुस्खे

दादी की उम्र कोई 70 के आसपास होगी| वे सामन्यतया फिट हैं| निरोगी हैं| मधुमेह, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियाँ उनके आसपास  फटकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाई| लेकिन जब से प्रयागराज कुम्भ से लौटी हैं, उनकी सेहत कुछ न कुछ गड़बड़ चल रही है|

सर्दी, जुकाम, बुखार, सिर दर्द आदि ने उन्हें घेर रखा है| लाख चाहने के बावजूद वे डॉक्टर के पास जाने को तैयार नहीं हैं| खुद ही देशी इलाज कर रही हैं| टीचर सलोनी, टीना और सुरभि को पढ़ा रही थीं| दादी को खांसी आने लगी| टीना दादी के पास पहुँची, सिर, गर्दन और पीठ पर मालिश करने लगी| उन्हें राहत भी मिली| इस दौरान टीना को लगा कि दादी को बुखार है| उसने टीचर की मदद ली तो यह बात पुख्ता हो गई| टीना दौड़कर मम्मी के कमरे से थर्मामीटर लेकर आई और दादी से मुँह खोलने को कहा| उन्होंने मना किया और उठकर बैठ गईं| शाम का समय था| दादी बोलीं-तुम लोग मिलकर मुझे बीमार घोषित करना चाहते हो| ऐसा मैं होने नहीं दूँगी| यह ध्यान रखना| सर्दी, जुकाम, बुखार को हम रोग नहीं मानते| इन्हें भगाना अपने बाएं हाथ का खेल है| तुम लोग पढ़ो, इनसे मैं निपट लूँगी|

दादी बिस्तर से उठीं| किचेन में चली गईं| अपने हाथ से तुलसी, अदरक, काली मिर्च, गुड़ का काढ़ा लेकर आईं और बिस्तर में बैठकर चुस्कियां लेने लगीं| बोलीं-देशी चीजों में आज भी बहुत दम है| चाहे देशी खान-पान हो या दवाएँ| आजकल शहरों में जिसे देखो वही विटामिन डी की गोलियाँ खाए जा रहा है| अरे भाई, सूर्य भगवान के शरण में रहो तो विटामिन डी की गोली कभी नहीं खानी पड़ेगी लेकिन यहाँ तो एसी से बाहर निकलने को कोई तैयार ही नहीं है| जाड़े में हीटर छोड़ने में भी परेशानी है| तुलसी पत्ती का रस निकालो| लोहे के चाकू को गरम करो और उसे रस में डाल दो| फिर तुरंत पी लो| कड़वा लगेगा लेकिन दिन में तीन-चार बार लगातार पीने के बाद बुखार हो या खाँसी, दूरी ही बना लेते हैं| तुलसी न मिले तो यही प्रक्रिया अदरक के साथ अपनाई जा सकती है|

आजकल बच्चों को शुद्ध सरसों के तेल की मालिश न करके न जाने किस-किस तेल की मालिश हो रही है| बच्चों की मांसपेशियाँ मजबूत नहीं होंगी तो वे जीवन में आगे कैसे बढ़ेंगे? दादी ने टीना से कहा-तुम्हारे पापा को मैंने 10वीं तक बुकवा लगाया है| बुकवा क्या है दादी-टीना ने पूछा| सरसों को पीसकर उसे शरीर में लगाया जाता है| फिर इसे छुडाने के बहाने पूरे शरीर की मालिश हो जाती है| छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े बच्चों तक को यह सुविधा देने की परम्परा रही है| इस तरह शरीर से गंदगी बाहर होती है| मांस पेशियाँ मजबूत होती हैं| रोम-रोम खुल जाते हैं| यह काम जाड़े के दिनों में धूप में करने की व्यवस्था थी| यहाँ से विटामिन डी फोकट में मिलता है| आजकल बच्चे चाकलेट खाकर अपने दांत बहुत जल्दी ख़राब कर रहे हैं| क्योंकि नीम से हमारा रिश्ता ख़त्म हो गया है| इस उम्र में भी अगर मेरे दांत साबूत हैं तो सिर्फ और सिर्फ नीम की वजह से| मैं तो कहूँ कि तुम सब भी नीम का दातून करना शुरू कर दो| दांत की सभी दिक्कतें खुद-ब-खुद दूर हो जाएँगी| आजकल तुम सब माउथ फ्रेशनर खाते हो| मैं कहूँ कि टेस्ट के लिए ही सही, नीम के दो-चार पत्ते रोज बासी मुँह खाकर देखो| पूरे दिन ताजगी बनी रहेगी और आपको किसी भी फ्रेशनर की जरूरत जीवन भर नहीं पड़ने वाली|

हमारे आसपास बहुत सी ऐसी चीजें हैं, जो सेहत के लिए मुफीद हैं लेकिन हम सब गोलियों के आदती हो गए हैं| बुखार की गोली खाओ तो भी दो-तीन दिन रहता है और न खाओ तो भी इतने दिन ही रहता है| तुलसी-अदरक का काढ़ा पीओ तो बुखार भी जाएगा| सर्दी में नाक से लेकर फेफड़े तक में जमा कफ भी गायब रहेगा| वह भी सिर्फ दो दिन में लेकिन मुश्किल ये है कि अब मम्मियों को ही नहीं पता है तो वे बच्चों को भला कैसे देंगी और कैसे उसके महत्व को समझेंगी| फिर काढ़ा बनाने में मेहनत भी तो लगती है और आजकल कोई मेहनत तो करना भी नहीं चाहता| सबको सभी चीजों का आसान विकल्प चाहिए| बस यही मुश्किल है| आजकल मैदे से बनी चीजें बच्चे पसंद करते हैं| पहले मोटा अनाज खाने की व्यवस्था थी| घर की चक्की में गेहूँ पीसा जाता था| फिर जब चक्की पर जाने लगा तो भी हिदायत होती कि थोड़ा मोटा ही रहे आटा| इस तरह अगर हमारे शरीर में मोटा अनाज, डालें, सब्जियाँ, सीजनल फल जाते रहें तो आधी समस्याएँ खुद ही ख़त्म रहेंगीं| बची आधी को हम योग, प्राणायाम, कसरत करके भगा सकते हैं| क्या बात है दादी-आपतो खजाना हो खजाना-टीचर सलोनी ने कहा| बोलीं-टीना का इम्तहान ख़त्म हो जाए तो मैं आपसे समय लेकर देशी इलाज समझूँगी| डायरी में नोट करूँगी| बात बन गई तो इसी पर मैं पहली किताब भी लिखूंगी| दादी ने सलोनी के गाल पर थपकी दी| बोलीं-हाँ-हाँ, सब बताउंगी| जितना भी इस बूढी खोपड़ी में है| अब जाओ| रात हो रही है| 

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