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ग्रामीण भारत की यह तस्वीर आपको भी ऊर्जा से भर देगी

मैं अपने अभियान ‘बस थोड़ा सा’ के तहत उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के सुरसा स्थित दयानंद इंटर कॉलेज पहुँचा| वहाँ पैरेंटिंग और बच्चों के हितों पर बातचीत होनी थी| लगभग नौ सौ छात्र-छात्राओं वाले इस स्कूल में 650 छात्राएं हैं| मतलब छात्रों की संख्या कम और बेटियों की ज्यादा| मैं ख़ुशी से झूम उठा अपने भारत की इस बेहद जुदा और खूबसूरत तस्वीर को देखकर| यह भरोसा भी जाग उठा कि नेहरू, गांधी, पटेल, अटल, मोदी के इस देश को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता| क्योंकि एक बेटी के पढ़ने का मतलब है दो परिवारों में सुधार की शुरुआत| देश की तरक्की की शुरुआत|

मैं जल्दी से जल्दी पैरेंट्स और बच्चों के बीच जाने को व्यग्र था| मैं उस गुत्थी को सुलझाना चाहता था जो मुझे कॉलेज कैम्पस में घुसते ही दिखी थी| बेटियों ने परिसर का अनुशासन अपने कब्जे में ले रखा था| छात्र भी थे लेकिन आनुपातिक तौर पर उनकी संख्या कम थी| कार्यक्रम स्थल सज चुका था| वन्देमातरम और भारत माता की जय के नारों के बीच मुझे पहुँचने का मौका मिला| मैंने देखा कि गुनगुनी धूप में घूंघट की आड़ लिए कोई सौ से ज्यादा महिलायें कुर्सियों पर आसीन थीं| उनके बगल में जमीन पर बेटियों के बैठने का इंतजाम था| वर्षों से अनेक स्कूलों में मेरा जाना हो रहा है लेकिन ऐसा दृश्य मैंने पहली बार देखा| ये सभी महिलाएं अपनी बेटियों-बेटों की तरक्की के लिए इस कड़ाके की ठंड में सुबह-सुबह स्कूल आ गई थीं| चूल्हा-चौका के समय कॉलेज तक पहुंचना उनके जागरूकता की पुख्तगी थी| इसी वजह से वे स्कूल में आयोजित कार्यक्रम में खिंची चली आईं| क्योंकि वे बेटियों को पढ़ाना और बढ़ाना चाहती हैं| उन्हें आसमान में देखना चाहती हैं| इसके लिए वे कोई भी कीमत चुकाना चाहती हैं या यूँ कहें की चुका रही हैं|

कार्यक्रम शुरू हुआ| मैंने उन सभी माओं और बेटियों को नमन करने के साथ ही अपना संबोधन शुरू किया| मैं खुद ग्रामीण परिवेश से निकला हुआ इंसान हूँ| मुझे पता है कि बड़ी संख्या में इन बेटियों को स्कूल भेजना कितनी बड़ी चुनौती का काम है और यह चुनौती माँ-बेटियों ने स्वीकार की है| अगर उनमें उत्साह न होता, जागरूकता न होती तो लड़कों के स्कूल में लड़कियों की संख्या 72 फीसद न होती| वे झंडा बुलंद करने में कामयाब न होतीं| मैंने अपनी बात समाप्त की और माइक पैरेंट्स, बच्चों को इस गरज से दिया कि अगर उनके मन में कोई सवाल हो तो पूछ लें| यहाँ कुछ पुरुषों के साथ ही मांएं भी सामने आईं| माइक हाथ में लिया| कार्यक्रम को लाभकारी बताते हुए दुआएं दीं स्कूल प्रबंधन को, मुझे भी| यह भी कहा कि इस तरह के कार्यक्रम लगातार होते रहने चाहिए| जिस दादी ने माइक हाथ में सबसे पहले थामा, उनकी उम्र कोई 65 रही होगी| घूँघट फिर भी था| वहीँ से उन्होंने बिना जुबान लडखडाये अपनी बात कही| लगा ही नहीं कि कोई घरेलू महिला माइक पर बोल रही हैं| फिर बेटियों की बारी आई तो सवाल वहाँ से भी आए| हालाँकि सवाल पूछने की शुरुआत छात्र ने की थी लेकिन फिर बेटियों ने ताबड़तोड़ सवाल पूछे|

यह आलम उस इलाके का है, जहाँ अभी भी बिजली के आने-जाने का समय कागज में तो तय है, असल में नहीं| लखनऊ से लगभग 120 किलोमीटर और हरदोई से 15 किलोमीटर दूर बसा सुरसा ब्लॉक मुख्यालय है| यहाँ थाना भी है और यह इंटर कॉलेज भी| फिर भी जागरूकता का यह आलम मुझे व्यक्तिगत तौर पर अपील कर गया| बेटियों और घूँघट की आड़ से उन पर सकारात्मक पहरा देने वाली जागरूक मम्मियों, दादियों को मैंने वायदा किया है कि बेटियों की तरक्की के लिए मुझसे जो भी बन पड़ेगा, करूँगा| इनका उत्साह देखकर लगा कि अगर इन्हें थोड़ी सी भी मदद मिल जाएगी तो ये बेटियाँ अपने गाँव, ब्लॉक, जिला और राज्य का ही नहीं, देश का नाम भी रोशन करेंगी| हमारी भ्रष्ट व्यवस्था इन्हें आगे बढ़ने से रोक नहीं पाएगी| नेता, अफसर चाहे जितना इन्हें पीछे करना चाहें, ये हर बाधा पार कर लेंगी| मुश्किलों से टकराना इनकी नियति भले हो लेकिन लक्ष्य के प्रति ये अडिग दिखीं| इन्हें पता है कि कैसे लड़ना है| मैं ऊपर वाले से दुआ करूँगा कि इन बेटियों को और ताकतवर बनाएँ और उनकी मम्मियों, दादियों की हिम्मत देते रहें, जिससे वे इस जालिम जमाने से टकरा सकें| आमीन!