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अपने बच्चों को आप ठीक से जानते हैं? नहीं तो जरुर पढ़ें

हाल ही में मेरी मुलाकात चार-पांच ऐसे पिता से हुई जो अपने बच्चों के लिए कुछ भी करने पर आमादा हैं| वे हर हाल में उन्हें तरक्की के रास्ते पर चलते देखना चाहते हैं| ऐसा करने के लिए वे किसी भी स्तर का त्याग, तपस्या करने को तैयार हैं| ये सभी सरकारी नौकरी में हैं और अच्छी शिक्षा-दीक्षा के लिए बच्चों को लखनऊ में किराये के घरों में रखे हुए हैं| सभी के बच्चे छठीं से लेकर नवीं कक्षा में हैं| उनका कंसर्न देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई| लगा कि अपनी मुहिम रंग ला रही है| पैरेंट्स का इस तरह केयरिंग होना निश्चित ही अच्छी बात है| इनके परिणाम भी बेहतरीन ही आएँगे, ऐसा मैं देख और महसूस कर पा रहा हूँ|

मैंने सभी से सवाल पूछा कि अभी आप अपने बच्चों को कितना समय देते हो| सबने कहा-पूरा समय दे रहे हैं| मेरा प्रतिप्रश्न था-बीते हुए कल के बारे में मुझे बताइए| एक ने कहा-छुट्टी पर आया हूँ तो थोड़ा देर तक सो गया| उठा तो बच्चे स्कूल चले गए थे| शाम को जब वे लौटे तब मैं कुछ दोस्तों के साथ घर में ही था| बोले, कभी-कभी ही आना होता है तो रिश्तों का ध्यान भी रखना पड़ता है| फिर शाम को हम सब सिनेमा चले गए| बाहर खाना खाया और लौटकर आए तो 11 बज चुके थे| बच्चों को जल्दी सुला दिया, क्योंकि उनका सुबह स्कूल था| मैंने कहा-यह सब तो अच्छा है| करना भी चाहिए| लेकिन इसमें बेटे-बेटी का एक पिता से कितना और किस तरह का संवाद हुआ| जवाब मिला-बिल्कुल नहीं| बस ख़ुशी इस बात की है कि परिवार ने एक साथ सिनेमा देखा| एक साथ बाहर खाना खाया| इन सभी बच्चों की अपनी मम्मियों से ठीक-ठाक बातचीत है| फिर मैंने मम्मियों से भी बातचीत शुरू की| पता यह चला कि बच्चे पापा से तभी बात करते हैं, जब मम्मी उनकी कोई ख़ास माँग ठुकरा देती हैं या फिर मम्मी ने किसी बात पर पिटाई कर दी| क्योंकि सभी पिता बाहर हैं, ऐसे में इससे ज्यादा ध्यान वो नहीं रख पा रहे हैं लेकिन अब सभी बड़े शहर में ही अपनी पोस्टिंग कराने का फैसला कर चुके हैं| क्योंकि उन्हें बच्चों को खुद से अच्छा बनाना है|

इसी मुद्दे पर बातचीत के लिए सब इकट्ठा थे| मुझे भी बुलावा था| ये सभी पिता ग्रामीण परिवेश में पैदा हुए, पले, पढ़े और बढ़े हैं| सबके पास सरकारी नौकरियाँ हैं| इन सभी का मानना है कि अब जमाना बदल गया है| बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए उनका और ध्यान रखा जाना जरुरी है| मैंने जोड़ा-सब लोग सबसे पहले अपने बच्चों को जानें| उन्हें जानने के लिए कुछ देर के लिए रोज बच्चा बनना होगा| उनके दोस्तों के बारे में बात करें| पसंद-नापसंद भी पूछें| यह भी जानें कि कौन सा विषय पढने में बहुत अच्छा लगता है? क्या काम करना अच्छा लगता है? पढ़ाई के अलावा किस चीज में रूचि है? ध्यान यह रखना होगा कि जब यह सब बातचीत चल रही हो तो बच्चों को यह न लगने पाए कि वे पापा से बात कर रहे हैं, उन्हें एहसास होना चाहिए कि किसी दोस्त से बात हो रही है| इसके लिए आप उनके साथ खेलते हुए यह बातचीत कर सकते हैं| बिस्तर में भी बात हो सकती है| और यह प्रक्रिया रोज होनी है| बाहर होने की स्थित में फोन पर भी कुछ सवाल पूछे जा सकते हैं| पिता-पुत्र या पिता-पुत्री के संवाद में कोई भी लगाव-छिपाव न रहे, माहौल का ऐसा बना देना पैरेंट्स की जिम्मेदारी है| जिस दिन कोई भी पिता यह कर लेगा, आधी समस्या ख़त्म हो जाएगी| मैं यह दावा नहीं करता कि फिर कोई समस्या नहीं आएगी| बिल्कुल आएगी| संभव है कि कोई नई ऐसी समस्या आए, जिससे आपका कभी सामना ही न हुआ हो| क्योंकि जब आप अपने बच्चों की उम्र में थे, उस जमाने में एक्सपोजर बहुत कम था| आज बच्चे समय से पहले मेच्योर हो रहे हैं| उनके मन में सवाल ज्यादा हैं| इन सवालों का हल होना बहुत जरुरी है| पहले दादा-दादी थे, नाना-नानी थे, जो सवाल हल कर दिया करते थे| आज वे हैं लेकिन सवाल इसलिए नहीं हल हो पा रहे हैं क्योंकि वे बच्चों के साथ नहीं हैं| ऐसे में सभी रिश्तों को जीने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ पेरेंट्स की है|

निश्चित ये सभी पेरेंट्स सराहना के पात्र हैं| अगर इनके बच्चे कुछ अच्छा करेंगे तो आसपास के बच्चों पर सकारात्मक असर पड़ेगा| धीरे-धीरे इन बच्चों के मेहनत, पसीना शहर और देश के काम भी आएगा| जब यह दिन आएगा तो पैरेंट्स खुश ही होंगे और गर्व भी करेंगे| उन्हें अपने बच्चों पर भी गर्व होगा और अपने फैसले पर भी| देखना रोचक और प्रेरक होगा| मुझे बहुत ख़ुशी होगी, जब ये बच्चे आगे बढ़ेंगे| क्योंकि इनके मम्मी-पापा खुश होंगे| आमीन!