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FAIL का एक मतलब है ‘फर्स्ट अटेम्प्ट इन लर्निंग’

इम्तहान का समय है| स्कूलों में छमाही इम्तहान का जोर है| बड़ी संख्या में बच्चे बोर्ड की तैयारियों में जुटे हैं| नौकरियों के लिए इम्तहान तो वर्ष भर चलते ही हैं| एक सच यह भी है कि नौकरियों में फेल ज्यादा, पास कम ही होते हैं| क्योंकि जितनी जगह होती है, उतने ही अभ्यर्थी सफल घोषित करने की व्यवस्था है| बोर्ड्स में जरुर फेल होने वालों की संख्या कम, पास होने वालों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा होती है| क्योंकि यहाँ फेल-पास का फैसला अंकों से होता है| लेकिन फेल होने की स्थिति में अभ्यर्थी निराश होते हैं, घर, परिवार में भी निराशा का माहौल बनता है| ज्यादातर मामलों में लोग युवा को ही दोषी ठहराते हैं| इस बार इसी मुद्दे पर विमर्श|

इस गंभीर मुद्दे को समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं| इस साल 2.41 लाख छात्रों ने ‘कैट’ का इम्तहान दिया है| जबकि भारतीय प्रबंध संस्थानों में कुल सीट संख्या चार हजार से कुछ ज्यादा है| आईआईटी में प्रवेश के लिए 11.50 लाख छात्रों ने हिस्सा लिया| यहाँ सीटों की संख्या अभी 11 हजार से कुछ ज्यादा है| वर्ष 2017 में आल इंडिया सिविल सर्विसेज में 11.37 लाख युवाओं ने फॉर्म भरे थे| वैकेंसी थी सिर्फ 1099| स्वाभाविक है कि चयन इतने का ही होना था| 2018 में तो जगह आठ सौ भी नहीं है| सरकारी नौकरियों का हाल कमोवेश यही है| एक पद चाहे चपरासी का हो या साहब का, कुछ सौ से लेकर हजारों की संख्या में आवेदक सामान्य बात है| जिसका चयन हो गया, जिसे आईआईएम या आईआईटी में प्रवेश मिल गया वे पास और जिसे नहीं मिला वे फेल, यही तो समाज कहता है| ऐसे ही तो परिभाषा गढ़ी जाती है| अब इस फेल पास के चक्कर में युवा बड़ी संख्या में डिप्रेशन में जा रहा है| ऊँच-नीच कदम उठा रहा है| जबकि सच यह है कि प्रवेश न होने मात्र से ऐसे नौजवानों को फेल कह देना उचित नहीं माना जाना चाहिए| क्योंकि एक बार फेल हो जाने का मतलब जिंदगी ख़त्म हो जाना नहीं होता|

महान वैज्ञानिक डॉ आरए माशेलकर ने छात्रों को संबोधित करते हुए ‘फेल’ की बहुत रोचक परिभाषा बताई| मैं खुद भी इस परिभाषा से सहमत हूँ| लेकिन अब जब डॉ माशेलकर को सुना तो और ताकत आ गई| उनके मुताबिक ‘फेल’ का मतलब ‘फर्स्ट अटेम्प्ट इन लर्निंग’ माना जाना चाहिए| इसके गूढार्थ को भी उन्होंने साफ़ किया| मतलब यह कि अगर हम इम्तहान में कामयाब न होने के बाद आत्म अवलोकन करें और यह जान लें कि आखिर कमजोरी रह कहाँ गई और उसी के अनुरूप तैयारी करें तो अगली बार कामयाबी तय है| जानना यह भी जरुरी है कि आईआईएम के अलावा ‘कैट’ से ही देश के कई अन्य महत्वपूर्ण संस्थान भी प्रवेश लेते हैं| आल इंडिया सिविल सर्विसेज में आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसी सेवाओं के अलावा कई दर्जन नौकरियां उपलब्ध हैं| जरूरत इस बात की है कि हम इसे सहज और ईमानदारी से स्वीकार कर पाएँ कि आखिर मेरी असफलता की वाजिब वजह क्या है? ‘कैट’ में कई बार 97-98 पर्सेंटाइल तक ही सीटें भर जाती हैं| इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि इससे कम 96 पर्सेंटाइल लाने वाला युवा कमजोर है या उन्हें हम फेल कहें| यह कहीं से भी उचित नहीं है| ऐसे युवा  आईआईएम के अलावा देश के अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में प्रवेश ले सकते हैं| अगर उन्हें आईआईएम में ही जाना है तो अगली बार सौ पर्सेंटाइल की तैयारी करें| यह बात घर-परिवार के सदस्यों को भी समझनी है| अगर आपका बच्चा 95-96 पर्सेंटाइल लेकर आया है तो उसे प्रोत्साहित करें, न कि ताने दें|

इस तरह डॉ माशेलकर की बातों से अगर युवा और अभिभावक सहमत होंगे तो देश की भावी पीढ़ी तनाव से बचेगी| बीमारी से बचेगी| एक जगह नहीं तो कहीं दूसरी जगह वह बेहतर परिणाम देगी| अगर हम उसे ताने देते रहे तो बात उलट भी सकती है| ध्यान देना जरुरी है कि ख़ुदकुशी जैसा कदम उठाने वाले युवा कहीं कहीं, अवसाद ग्रस्त होते हैं| यह अवस्था एक दिन में नहीं आती है| इसे संभाला जा सकता है| इस पर नजर रखते हुए हम इसे रोक सकते हैं| वर्ष 2016 के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक देश में ख़ुदकुशी करने वालों की संख्या बढ़ रही है| इस साल 2.30 लाख लोगों ने मौत चुन ली और इनमें बड़ी संख्या युवाओं की थी| यह खतरनाक है| इसे रोका जाना चाहिए| और यह काम सिर्फ और सिर्फ घर-परिवार के लोगों के अलावा दोस्त कर सकते हैं| डॉ माशेलकर के सिद्धांत पर जरुर गौर फरमाएँ| यह देश-समाज के हित में साबित होगा|