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इत्ती सी उम्र, घुटनों, कमर में दर्द, बात कुछ हजम नहीं हुई

हाल ही में मेरी मुलाकात अलग-अलग बड़े कारपोरेट हाउसेज के साथ काम करने वाले युवक-युवतियों से हुई| इसे संयोग कह सकते हैं कि इनमें किसी की उम्र 30 वर्ष से ज्यादा नहीं थी| कोई तय प्रोग्राम नहीं था| हल्के-फुल्के मूड में बात शुरू हुई| दिल्ली, नोएडा, गुरुग्राम में काम करने वाले 18-20 युवाओं में ज्यादातर खुल गए| दो घंटे की बातचीत यूँ तो बहुत रोचक रही| मैंने इन सभी से बहुत कुछ सीखा, लेकिन एक बात जो मुझे खटकी,यहाँ उसी की चर्चा| 
ज्यादातर अपनी सेहत को लेकर बेहद लापरवाह दिखे| किसी के घुटने में दर्द आम बात है तो किसी के कमर में| पेट की शिकायत तो लगभग सभी ने की| सीढ़ियाँ चढ़ने में बहुतों को दिक्कत आती है| लंच, डिनर, ब्रेकफास्ट के लिए सभी के अपने नियम हैं| और इसके लिए अपने-अपने बहाने भी| जब मैंने सवाल फेंका कि इस उम्र में जो दिक्कतें आप सब फेस कर रहे हो, तो 40 के बाद तक तो आपकी सेहत का बुरा हाल हो जाएगा| जबकि देश को आगे ले जाने की जिम्मेदारी आपकी ही है| इस पर युवाओं की यह टोली कुछ नए तरह के बहाने बनाने में जुट गई| एक युवती ने कहा-मैं नाईट शिफ्ट करती हूँ| मल्टीनेशनल कंपनी है| यह सिलसिला शुरू हुए दो साल से ज्यादा हो गए| रात भर काम, दिन भर सोना| इस सूरत में मैं कैसे अपनी सेहत का ध्यान रखूँ और कब? देश की इस बेटी को काम शुरू करना होता है रात में 9 बजे और काम समाप्त होता है सुबह 5 बजे| दो से ढाई घंटा समय दफ्तर आने-जाने में भी लगता है| इस बेटी का यह भी कहना है कि आदत इतनी ख़राब हो गई है कि शनिवार, इतवार की छुट्टियों के समय भी रात में कई बार नींद नहीं आती|
अपनी बातचीत में मैंने किसी को खारिज नहीं किया| क्योंकि सभी का अपना जीवन जीने का तरीका है| लेकिन मैंने अपनी बात रखी| सुबह 6 बजे तक घर पहुँचने वाली बेटी आकर सीधे बिस्तर में घुसती है और खो जाती है नींद में कहीं| दो, तीन, चार बजे, जब भी आँख खुलती है तो स्नान आदि करने के बाद नाश्ता, लंच, जो भी कहिए, होता है| इस समय जो भी बनता है, उसी में से दो पराठे, रोटी डिनर के लिए पैक होता है| शाम सात से साढ़े सात के बीच घर छोड़ देती है यह बेटी| मैंने उसके लिए जो समय सारिणी सभी युवाओं की सहमति से बनाई, वह कुछ यूँ रही| सुबह छह बजे घर पहुँचने के बाद वह हाथ-मुँह धोये| ब्रश करे| दो बिस्किट के साथ एक कप चाय-काफी पिए| फिर सात-सवा सात तक सो जाए| 12-12.30 बजे उठने का सुझाव मैंने दिया| इसके बाद फ्रेश होने के बाद कुछ खाने का सुझाव दिया| इसके बाद घर से निकल कर सब्जियाँ लाये| प्रयास हो कि सब्जी लाने के दौरान कम से कम दो किलोमीटर पैदल चला जाए| सब्जी न भी लानी हो तो भी घर से बाहर जाए और आधा घंटा से पैंतालीस मिनट तक सड़क पर, पार्क में कहीं भी घूम ले| फिर लौट आए और तीन बजे फिर सो जाए| दो-ढाई घंटे बाद उठकर डिनर आदि की तैयारी करे| दफ्तर जाने से ठीक पहले डिनर कर ले| दफ्तर जाते समय कुछ हल्का पेय पदार्थ या फिर खाने की चीज ले जाए और उसे रात 10 बजे के आसपास ले ले|दफ्तर में या कहीं और भी तय कर लें कि लिफ्ट का इस्तेमाल कम से कम पाँच फ्लोर तक नहीं करेंगे| रात में काम करते वक्त जब भी समय मिले, चहलकदमी करना न भूलें| इस दौरान दफ्तर में ही कोई जगह देखकर हाथ-पाँव-कमर-शरीर के अन्य जोड़ों की कोई एक्सरसाइज भी सुबह चार बजे के आसपास 10-15 मिनट के लिए कर सकते हैं| खाने में फल, सब्जियाँ, सलाद की मात्रा बढ़ा दें, आपके सेहतमंद रहने की सम्भावना खुद-ब-खुद बढ़ जाएगी|
अपनी-अपनी दिनचर्या के हिसाब से सभी को कुछ इसी तरह थोड़ी सी धूप, खानपान में सुधार आदि का सुझाव देने के बाद मैं चुप हुआ| सामने से मिश्रित प्रतिक्रिया आई| किसी ने उत्साह से फॉलो करने पर सहमति दी तो किसी ने फिर से बहाने बनाने शुरू किए| एक युवा ने कहा-सर, यह कहना आसान है लेकिन करना मुश्किल| फिर मैंने उनकी उम्र में अपने रूटीन का खुलासा किया और यह भी कि तुममे से ज्यादातर मेरी आधी उम्र के हो लेकिन अभी भी मैं एकमुश्त 10-15 किलोमीटर पैदल चल सकता हूँ| धूप मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा है| संतुलित खान-पान के साथ ही मैं मधुमेह जैसे रोग के बावजूद खुद को फिट महसूस करता हूँ| यह सुनने के बाद युवाओं की टोली चुप हुई और सभी ने एक स्वर से कहा कि अब से वे अपनी दिनचर्या में सुधार करेंगे| क्योंकि स्वस्थ युवा ही स्वस्थ भारत है| शुभकामनाओं और फिर मिलने के साथ सभा विसर्जित हुई।