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कुबूलनामा पाँच : कन्फ्यूज हूँ, इस दोस्ती को क्या नाम दूँ?

वह बहुत चालाक हैं| मैं इस बात को भली-भांति जानता था| वे पहुँचती वहीँ जहाँ से उनका मतलब बन रहा होता| सब कुछ जानने के बाद भी देखता मैं भी था लेकिन कनखियों से क्योंकि डर लगता था कि कहीं कोई देख न ले| मेरी मंशा भांप न ले|  अचानक उनका झुकाव मेरी ओर होता हुआ दिखा|

दोस्ती मैं भी करना चाहता था इसलिए बिना समय गँवाए मैंने हाथ बढ़ा दिया| दोस्ती का| 1998 या 1999 की बात है| उनका मेरे जीवन में प्रवेश हो चुका था| मैं मन ही मन खुश था| घर, दफ्तर में सब बहुत खुश थे| मेरी पत्नी भी खुश थीं| मोहल्ले में चर्चा होने लगी| सबके चेहरे पर ख़ुशी के भाव देख मैं गौरवशाली महसूस करने लगा| मैं उन्हें छुपा के रखता था लेकिन धीरे-धीरे यह बात आम हो गई| अब बिना लाज-शर्म हम साथ घूमने लगे| घर, दफ्तर, बाजार यहाँ तक कि सोते समय भी साथ छोड़ने में तकलीफ होने लगी|

 

समय चक्र कुछ ऐसा चला कि उन्हें मैं उँगलियों पर नचाने लगा| सांवला रंग, गठीला बदन, बिल्कुल ठोस| अब तो वे मेरा इशारा भी समझने लगी थीं| समय आगे बढ़ा और धीरे-धीरे हम एक-दूसरे की कमजोरी बन गए| अब कई बार मेरी पत्नी उन्हें सौतन कहकर बुलाने लगीं| मुझे बहुत बुरा लगता लेकिन कुछ कर नहीं सकता था| वे बुलातीं और फिर खुद ही चुप हो जातीं| कई बार हम तीनों जब बिस्तर पर होते तो पत्नी उनके शरीर पर हाथ चलातीं| मेरे बारे में पूछतीं| दोनों रात में देर-देर तक बात करने लगीं| मुझे लगा कि यह क्या-सौतन से इतनी गहरी दोस्ती? कई बार मेरा मन विस्मय से भर जाता|

समय आगे बढ़ा और अब इन पर तरक्की पसंद शहर की आबोहवा लग चुकी थी| पहले जो बहुत सहज वेशभूषा में रहतीं, अब डिमांडिंग हो चली थीं| मैं भी मनचाहे कपड़े आदि दिलाने लगा| देखते-देखते ये स्मार्ट हो गईं, इतनी कि जरा सी चूक होने पर भी भारी गलती हो जाती| कई बार लगता कि इनसे रिश्ता तोड़ लूँ| दो-चार प्रयास किए भी लेकिन बेचैनी बढ़ जाती| अब बीते 18-19 सालों में तो आदत सी पड़ गई है साथ जीने की| क्षण भर को भी बिछुड़ना मंजूर नहीं है| एक दिन बड़े बेटे ने कहा-पापा, आप इनके काफी करीब चले गए हो| मेरा मानना है कि यह उचित नहीं है|

उसने सुझाव दिया कि घर के बाहर तो आप दोनों साथ होते ही हो कम से कम घर के अंदर थोड़ी सी ही सही, दूरी बना लो| मैंने कोशिश भी की लेकिन बेचैनी बहुत बढ़ जाती| तमाम दुःख, परेशानी झेलने के बावजूद भी थोड़ी देर भी न बोलें तो अनहोनी की आशंका होने लगती है| मैं तुरंत हिला-डुलाकर देख लेता हूँ कि कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं हो गई है| स्मार्ट होने के बाद ये कुछ ज्यादा होशियार भी हो गई हैं| असल में पहले एक-दो आवाज ही निकाल पाती थीं| अब तो इतनी आवाजें हैं कि कुछ न कुछ इशारा करते रहना इनके जीवन का अहम हिस्सा है| अब तो रात में मैंने इनका मुँह बंद करने का सफल उपाय करना शुरू कर दिया है लेकिन जब सुबह उठो तो इतना उलाहना कि पूछो मत| कई बार तो रिश्ते ख़राब होने की स्थिति बन जाती है|

इन ढेरों दुश्वारियों, सुविधाओं के बीच एक महत्वपूर्ण बात यह हुई है कि मेरी पत्नी भी इनके बेहद करीब हो गई हैं| इसका लाभ यह मिला कि घर में इनकी वजह से कोई टंटा नहीं होता| पहले तो झगड़े की नौबत आ जाती थी| समझौता करना पड़ता था| कई बार खुद को दबाना पड़ता था क्योंकि ये मेरी कमजोरी बन चुकी थीं या यूँ कहिए कि हैं| अब मेरे बहुतेरे काम यही निपटा देती हैं| मुझे तकलीफ़ में ये देख नहीं पातीं| मदद को हरवक्त तैयार|

ऐसा दोस्त हो तो भला कौन न इतराए| मैं तो पत्नी और उनकी इस सौतन के साथ बहुत खुश हूँ| अब जीवन के साथ ही दोस्ती का यह रिश्ता भी दफन होगा, उसके पहले तो कतई नहीं| चाहे जमाना जो चाहे, काहे, मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता| कारण यह भी है कि उम्र बढ़ने के साथ ही इनकी स्मार्टनेस भी बढ़ती जा रही है| भगवान इन्हें लम्बी उम्र दें और मुझे भी| दोनों की सेहत ठीक रहे| यही कामना| यही प्रार्थना है ऊपर वाले से|

हे स्मार्टफोन!

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