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कुबूलनामा चार : पत्नी, वो और हँसी-ख़ुशी के 22 बरस

उनसे मेरी मुलाकात एक हादसे के साथ हुई| कह सकते हैं कि हादसे में उनकी प्रमुख भूमिका भी रही| क्या बताऊँ, कैसे बताऊँ, और न बताऊँ तो क्यों न बताऊँ? असल में यह बात कोई 22 वर्ष पुरानी है| उन दिनों मैं भगवन श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में था| रक्तदान शिविर में भाग लेने के इरादे से जिला अस्पताल पहुँचा| लैब में सैम्पल लिया गया और फिर थोड़ी देर बाद आने को कहा गया| निर्देश के मुताबिक तय समय पर मैं पहुँच गया|

वहीँ हुई मुलाकात| पहली नजर में ही लगा कि कुछ तो है अगले में| फिर क्या दोनों ओर से एक साथ, हाथ आगे बढ़े| जीवन भर साथ निभाने का वायदा भी हुआ| हम वहाँ से हाथ में हाथ डाले जमाने से बेपरवाह चल पड़े| पत्रकारिता में होने की वजह से अस्पताल में ज्यादातर डॉक्टर मुझे जानते थे| आप ऐसा भी कह सकते हैं कि दोस्ती जैसी थी| मैं इतनी जल्दी में था कि सभी से मिलवा देना चाहता था लेकिन जिसके पास पहुँचा, उसी ने उम्मीदों से ज्यादा समय लिया| सभी प्रभावित थे मेरी इस नई-नई प्रेयसी से| ऐसे में मैं तीन-चार डॉक्टर साहेबान से मिला और निकल पड़ा घर की ओर| मेरी पत्नी कुछ समझ पातीं, उससे पहले मैं इस ख़ास दोस्त के साथ घर में दाखिल हो चुका था|

 

परिचय के साथ ही मैंने पत्नी को जानकारी दी कि ये मोहतरमा अब अपने ही साथ रहने वाली हैं| मेरी पत्नी पहले दुखी हो गईं| तनिक देर बाद भोकार छोड़कर रोने लगीं| मैंने बहुत समझाया भी| थोड़ी देर के लिए माहौल टेन्स भी हुआ| लेकिन मैं उनके धैर्य का कायल हो गया, जब तमाम विपरीत हालातों में भी उन्होंने मेरी इस नई-नवेली प्रेयसी को घर में रहने की अनुमति दे दी| दिल में तो वे पहले से ही घर बना चुकी थीं| अब मेरे सामने चुनौती यह थी कि दोनों से तालमेल बनाने की, जिससे घर शान्ति से चलता रहे| मैं जब भी काम के लिए निकलता तो ये मोहतरम भी साथ हो लेतीं| पत्नी ने मेरे साथ जाने की कभी जिद नहीं की लेकिन यह एक नई समस्या मेरे सामने आ गई थी लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकता था| अब साथ में ही घर से निकलना, चाय-नाश्ता, खाना, सोना सब होने लगा| आप कह सकते हैं कि हम एक जिस्म जैसे हो गए|

पत्नी तो कई बार ऐसा हुआ कि कभी मोहब्बत में तो कभी गुस्से में, कभी मजबूरी में साथ छोड़ देतीं लेकिन कुछ देर के लिए लेकिन इनके प्यार में मैं ऐसा फँसा कि क्षण भर की भी गुंजाइश नहीं थी अकेला रहने की| कई बार वाकई गुस्सा आती, ख़ास तौर से तब जब दोस्तों के साथ पार्टी में होता| जितना ख्याल पत्नी घर में रखतीं उससे ज्यादा ये पार्टी में रखने लगीं| मन करता कि रबड़ी-इमरती एक साथ लेकर खाऊं तो ये प्लेट हाथ से लेकर फेंक देतीं| ऐसा बहुत बार हुआ| बड़ी बेइज्जती महसूस करता था मैं लेकिन प्यार के फ़ांस में फंसकर कुछ भी नहीं कर पाता था| मन मसोस कर रह जाता| गुस्सा बहुत आती लेकिन कोई समाधान नहीं था| धीरे-धीरे मैंने सामंजस्य बनाना सीख लिया|

मेरी पत्नी कई बार कहती भी हैं कि तुम्हारे साथ बस सिर्फ इसी जन्म, बाकी छह जन्मों की कसम उन्होंने शादी के कुछ दिन बाद ही तोड़ ली थी पर इन्होनें तो यहाँ तक तय कर लिया है कि राजा राम मोहन राय के आन्दोलन को धुल-धूसरित कर डालेंगी| अंतिम क्रिया चिता तक साथ देने वाली हैं ये मोहतरमा| जब इन्होंने मुझसे यह कसम खाई तो मेरी आँखें नम हो गईं| समर्पण का यह भाव देख मेरी पत्नी और पूरा परिवार अब उन्हें स्वीकार कर चुका है| सब के सब तैयार भी हैं इस प्रेयसी को अन्तिमक्रिया में शामिल करने पर| अब जब सब तैयार हैं तो भला मेरी क्या हैसियत और मैं कौन सा रहूँगा, देखने के लिए|

लेकिन हाँ, इस प्रेयसी को आए 22 वर्षों से ज्यादा हो गए हैं लेकिन मैंने पत्नी और इनमें कोई फर्क नहीं किया| सब कुछ दोनों ओर बराबर बराबर बाँट देता हूँ| कई बार पत्नी संतोष करके अपनी सौतन को ज्यादा भी दे देती हैं लेकिन कभी तकरार नहीं सुनी मैंने| न ही चेहरे पर शिकन देखा| पत्नी के इस भाव को देखकर मेरे मन में उनके प्रति सम्मान और बढ़ गया है| मैं यह भी जान पाया हूँ कि माँ के पास कितना धैर्य होता है| पति की इच्छा-मंशा के विरुद्ध वह कम ही जाती हैं| लेकिन शिकायत इधर भी कुछ नहीं है| खाना-खर्चा चलता रहे, बस| और कोई डिमांड नहीं आई|

मैं भी बैलेंस बनाना सीख गया हूँ| इन्हें मैनेज करने में मुझे उतनी ही मेहनत करनी होती है, जितनी पत्नी को| अगर आप पत्नी को पटा लेना जानते हैं तो इन जैसों को आप आसानी से मैनेज कर सकते हैं| खान-पान, रहन-सहन से ही हमने बैलेंस बनाया हुआ है| अगर आपके जीवन में भी कुछ ऐसा है तो मुझसे कोचिंग ले सकते हैं, वैसे मेरी ऊपर वाले से यही दुआ है कि मेरा अगर कोई दुश्मन भी हो तो उसकी भी मुलाकात न हो| क्योंकि बैलेंस करने में ही जीवन निकल जाएगा| यह मैं अब जान चुका हूँ|

खैर, मेरे यार दोस्त, घर-परिवार, रिश्तेदार सब मिल चुके हैं अब तक| सबने मान्यता भी दे दी है इन्हें लेकिन मैं आप से नहीं मिलवा पाया था| समय वह अब आ सका| कोई नहीं, वो कहते हैं न-देर आयद, दुरुस्त आयद| अब मिल लीजिए| ये मिठास से भरपूर हैं और नाम है मधुमेह|

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