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केन्द्रीय मंत्री का बयान और देश में मेडिकल पढ़ाई का सच

दिनेश पाठक.

केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं श्री प्रह्लाद जोशी| उनका मानना है कि जो बच्चे NEET क्लीयर नहीं कर पाते, वे डॉक्टर बनने का सपना लिए विदेश चले जाते हैं और वहाँ से एमबीबीएस की डिग्री लेकर वापस आ जाते हैं|

उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब युद्ध के दौरान युक्रेन में फंसे भारतीय बच्चों की वापसी पर देश में हंगामा मचा हुआ है| कर्नाटक के एक मेडिकल स्टूडेंट को हम खो चुके हैं| नवीन नाम का युवा गोलीबारी का शिकार हुआ है| देश में आक्रोश है|

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस मसले को प्राथमिकता पर रखते हुए तेजी से युक्रेन में फंसे भारतीय स्टूडेंट्स को वापस लाने का क्रम शुरू किया लेकिन यह एक दिन का काम नहीं है| चार मंत्री आसपास के देशों में कैम्प कर रहे हैं| रोज जहाज में बच्चे स्वदेश आ रहे हैं लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में भारतीय युवा युक्रेन में फँसा हुआ है| जान खतरे में है|

लगभग 20 हजार भारतीय स्टूडेंट्स युक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं| मेरा मानना है कि ये सभी बच्चे मेधावी हैं| इन्हें फेल करार देना, भारतीय मेधा की बेइज्जती करना है| मंत्री जी से कुछ छिपा नहीं है| वे सब कुछ जानते हैं फिर भी असल समस्या की ओर ध्यान न देकर इधर-उधर भटका रहे हैं|

खैर, मेडिकल पढ़ाई से जुड़ा कुछ डेटा सबको पता होना चाहिए| हर वर्ष औसतन 10-12 लाख स्टूडेंट्स मेडिकल में प्रवेश के लिए दावेदारी करते हैं| केंद्र, राज्य के मेडिकल कॉलेज, निंजी मेडिकल कॉलेज मिलाकर लगभग छह सौ हैं| इन सभी में एक लाख सीटें नहीं हैं| बड़ी मुश्किल से 88 हजार सीट्स एमबीबीएस में उपलब्ध हैं| इनमें आधी से भी कम सीटें सरकारी मेडिकल संस्थानों में हैं| बाकी निजी संस्थानों में उपलब्ध हैं| इस तरह एक सीट पर 13 से ज्यादा दावेदार हैं|

जिसका एडमिशन सरकारी कॉलेज में हो गया उसकी फीस तो अपेक्षाकृत कम है लेकिन जिन्हें निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिला उन्हें फीस के रूप में मोटी रकम देनी होती है| यह लगभग सवा करोड़ रूपये है| अब यहीं से विदेश में पढ़ाई करने का रास्ता खुलता है|

आरक्षण की व्यवस्था कुछ ऐसी है कि सामान्य कटेगरी का युवा 10 अंक पाकर एडमिशन नहीं पा सकता और आरक्षित कटेगरी का युवा उसके आधे से भी कम अंक पाकर सरकारी कॉलेज में सहज प्रवेश पा जाता है| निजी कॉलेज में फीस और सरकारी कॉलेज में एडमिशन न मिल पाने की वजह से बड़ी संख्या में मेडिकल स्टूडेंट विदेश का रुख करते हैं| क्योकि वहाँ अभी भी मेडिकल की पढ़ाई सस्ती है और यह तथ्य मंत्री जी समेत किसी से भी छिपा नहीं है|

140 करोड़ के देश में अभी भी एक लाख मेडिकल सीट्स नहीं हैं| यह जिम्मेदारी किसकी है? निजी मेडिकल कॉलेज मनमानी फीस वसूलते हैं,इन पर रोक लगाने की जिम्मेदारी किसकी है? अगर हमारे युवा विदेशी धरती पर जाकर पढ़ाई कर रहे हैं तो इसके पीछे कारण क्या है? इस पर विचार कौन करेगा? स्पष्ट है कि इन सभी सवालों का जवाब यही है-केंद्र एवं राज्य सरकारों को आगे आना होगा| मेडिकल की सीट्स बढ़ानी होगी| फीस अपने आपमें बड़ी समस्या है| इसे देखना होगा| केन्द्रीय मंत्री का बयान निहायत ही बचकाना है| समस्या से मुँह मोड़ने जैसा है|

हम अगर वाकई चाहते हैं कि देश की मेधा विदेशी धरती पर न जाए तो मेडिकल सीट्स बढ़ानी होगी| नए मेडिकल कॉलेज खोलने होंगे| सबसे जरूरी बात, फीस कम करनी होगी| देश में डॉक्टर्स की कमी भी किसी से छिपी नहीं है| फिर मंत्री जी या किसी भी जिम्मेदार का घटिया बयान निंदनीय है| शर्मिंदा करने वाला है|